Tuesday, 30 June 2015

कविता ४४. किताब की कहानी

                                                        किताब की कहानी
जिस कहानी में कई तरह के किरदार होते है सारे मोड़ कहानी में बार बार हम देखते है उन कहानी में कई मोड़ हमें कहानी में नये नये मोड़ हर रोज लाते है इस कहानी में सारे नये नये सोच हमारे मन में आते है
कहानी में हर तरह तरह के मोड़ जिन्दगी में हर बार आते है कहानी में सारे मोड़ नयी सोच लाते है
जो चीज़ कहानी में हमने देखी है हम हमेशा सोचते थे हम जिन्दगी में हर बार हम पाते रहते है
जब कहानी सीधे तरह से हमे आगे ले जाती है कहानी हर बार हर पन्ने में नयी सोच सभी पाते है
कहानी में तरह तरह के मोड़ हमेशा आते है कहानी को हम हमेशा हर मोड़ पर नये तरीके से समजते है
पर आज तक कभी नहीं समजा हमने कहानी में नयी सोच हम देखते है जिन्दगी में नये मोड़ लाते है
कहानी में कई मोड़ नये तरीके से समज पाते है जिन्दगी में हमेशा यह नये तरीके सिर्फ किताब में होते है
पर जिन्दगी में नयी सोच अंदर आती है वह सोच हमें सीखाती है किताब जूठ नहीं कहती है क्युकी वह बात जिन्दगी खुद में दिखाती है
कहानी फिर जिंदा होती है हर बार उन तरीकों से हमे पहले मुसीबत होती थी आज कल हम उन्हें समजा करते है
हर बार जिन्दगी को हमने जब उन नयी आँखो से देखा अपनी जिन्दगी को नये असर जिन्दगी पर असर लाती है
नयी सोच जब जिन्दगी में आती है जब हमने ख़ुशी से देखा जिन्दगी पर अच्छा असर लाती है और वह नयी सोच हमारे मन पर असर करती है
जिन्दगी में हम उन नयी चीज़ों को उम्मीद से देखते है हर बार जब हम यही सोचते है की जिन्दगी के किताब में वही मिलता है
जो उस किताब में मिलता है जिसे हम पढ़ते है अगर हम समज पाये उन अच्छी बातों को तो हम जिन्दगी में सही ओर चलते है
किताब में हुए मोड़ जब जिन्दगी में मोड़ बन जाते है तब वह हमे ख़ुशी ही दे जाते है क्यों की किताब तो आखिर में ख़ुशी ही देती है अगर उस बात को समज पाये तो खुशियाँ ही पाते है 

कविता ४३. फूल

                                                                     फूल 
फूलोंने कहा है नये नये रंग हर बार हमारे मन को छू लेती है और फूल में नये सुंदर रंग जिंदगी दिखाती है 
चुने बस उस फूल में मासूमीयत मन में आती है उन फूलो की खूबसूरती मन को खुशियाँ देती है 
हर बार जब फूलों में वह खूबसूरती मन को ख़ुशी देती है नाजुक तरह के फूल हमेशा मन को अच्छी सोच देते है 
फूलों के सारे रंग हमें रोज ख़ुशी दिलाते है फूल हमेशा नाजुक ही नहीं होते है कभी कभी फूलो में काटे है 
वह हमेशा दर्द देते है फूल बहोत मासूम दिखते है पर उनमे तरह तरह के रंग और रूप हमेशा भाती है 
फूल में कई मासूम रूप उनके अंदर पाते है फूल वही जो तरह के रूप हमें दिखाते है हर फूल जो मन को छूते  है 
हर बार रोशनी देते है फूल जो हर तरह के रूप में खुशियाँ देते है फूलो में कई रूप है जिन में हम जिन्दगी पाते है 
फूल जो हमें खुशबू देते है फूल तो कितनी तरह की चीज़े अंदर पाते है फूलो में जो नये नये रूप छुपे है 
मन को ख़ुशी दिलाते है फूल जो दिखते  है सुंदर हर बार हमे अच्छे लगते है फूलो के मासूम रूपों पर हम हर बार इतराते है 
ऐसा कोई पेड़ हम लगाये तो उसकी खुशबु को हम मन से पाते है उन सारे फूलों को देखकर पेड़ बहोत सुंदर दिखते है 
माना की वह फूल कुदरत का करिश्मा है पर हम ऐसे इतराते है जैसे हमने ही वह फूल बनाये है 
जब के सबकुछ सिर्फ कुदरत बनती है फिर भी हम उन फूलो में खुशियाँ पाते है उन फूलों में जिनमे सपने सजे हो हम उन फूलो को पाते है
फूलों में जो रंग छिपे हर बार हम पाते है उन रंगों में हम खुशियाँ पाते है फूल जो बहोत सुंदर लगते है 
की हर बार हमे जो मन में खुशियाँ देते है फूल जो कुदरत बनाती है उसे हम आसानी से अपनाते है पर फूल खूबसूरत लगते है 
पर अगर कुदरत की बनायीं खूबसूरत चीज़ हम अपनाते है पर वही कुदरत जब कुछ अलग दे हम कतराते है 
काश के हम सब कुछ उसी तरह हसकर अपनाते जैसे हम उन खूबसूरत फूलो को अपनाते है और जिन्दगी भर इतराते है 

Monday, 29 June 2015

कविता ४२. ख़ुशी

                                                                    ख़ुशी
ख़ुशी वही नहीं जो हर बार हसाये हमे कभी कभी वह भी होती है जो हसाये किसी ओर को ही
ख़ुशी वही नहीं होती जो हर बार हमारी होठों पर मुस्कान लाये कभी कभी आँखों में आँसू लाये वह भी होती है ख़ुशी
हर बार हम उसे किसी से जोड नहीं सकते परिंदे की तरह आजाद होती है वह है हमारी ख़ुशी जो हर मोड़ पर उड़ती है
कभी ना रूकती है ना ठहरती है ऐसी आजाद होती है हमारी खुशियाँ सभी ना उन्हें हँसी जोड़ सकती है ना गमो से डरती है वह होती है ख़ुशी
कितनी भी मुसीबत हो पर फिर भी हमारे घर पर दस्तक देती है ख़ुशी बल्कि जब वह आती यही है मुसीबते भाग जाती है
उसी अहसास को कहते है हमसब ख़ुशी अगर हम चाहे तो भी बांध नहीं सकते क्युकी कभी एक जगह पर रूकती ही नहीं है ख़ुशी
वह तो एक परिंदा है जो एक डाली से दूसरी डाली पर जाता घूमता रहता है क्युकी सबसे जरुरी है हमारे लिए हमारी ख़ुशी
वह एक सोच है जिस पे ना कोई रोक टोक है किसी के भी कहने आती जाती नहीं है ख़ुशी वह तो  बस घूमती है हर डाली पर जाती है
क्युकी हर मोड़ पर मन को बहलाती है ख़ुशी हर कोई बस उसी के इंतज़ार में खड़ा है पर बता नहीं है किसीको  कब कहा मिलेगी ख़ुशी
काश हम यह समज पाये की जितनी हमारे हिस्से  में है उतनी ही हासिल होगी हमे हमारी ख़ुशी पर हम सब यही सोचते है की
हमे ही कमानी है हमारी ख़ुशी अगर कमानी भी है तो सिर्फ दुःखोंमे भी हस दो तो मिल जाये ही ख़ुशी अगर मुमकिन नहीं है तो शिकवा है कैसा इंतज़ार करो तब तक जब तक आती नहीं है ख़ुशी 

कविता ४१. जरूरत

                                                                     जरूरत 
एक सोच सी उठती है कई बार दिल में आती है ओर फिर चली जाती है सारे तूफानों से जुंजके एक सोच सी आती है जो हर बार हर राह पर नयी उम्मीद लाती है
उस सोच को थामो जो उम्मीद सी लाती है उस सोच को समजो जो हमे नये किनारे दिखाती है   उन तूफानों से क्या डरना जो साथ वह लाती है 
जब कोई ताकद से घूमता है तो धरती तो हिल ही जाती है उस सोच को समजो जो जीना सीखती है कागज   की कश्ती नई उम्मीद लाती है 
हार या जीत तो हर बार किस्मत ही लाती है पर मेहनत तो हर बार हमे ही करनी पड़ती है उस सोच को थामो जो उस मेहनत को सीखाती   है 
उस सोच को समजो जो हमे तूफानों से दूर नहीं रखती पर उनसे लढना सीखती है सोच तो वह आईना है जो दुनिया दिखाती  है 
पर हर बार सही नहीं कभी कभी गलत ओर से भी दिखता है उस सोच को थामो जो सही राह पर चलती गिरने पर भी संभलना सिखाती है 
सोच तो ऐसी हो जो आगे बढ़ना सिखाये मुसीबतों में भी हमें खुशियों के दे साये जो पिछे हटना सिखाये वह सोच ही गलत है जो कश्ती को खुद ही डुबाये उस सोच में क्या दम है 
सोच तो ऐसी हो जो किनारों से नहीं तूफानों से लढना सिखाये क्युकी किनारों पे नही मिलते कोई दिलचस्प साये तो वह सोच जगाओ जिस में उम्मीद बसी है 
सोच तो वह हो जिस से दुनिया बदलती है दूसरों से पहले अपनी दुनिया को ही समजो वह सोच जगाओ जिस में अपनी जिंदगी बसी है 
सोच वह रखो जिस में खुशियाँ तो मिले पर सोच वह भी हो जो सही राह पर चले सोच वह जगाओ जिस पे रोशनी भी है सोच वह राह दिखाती है जिस में ख़ुशी भी है 
पर कभी कभी सोच तूफानों से लढ़ती एक कश्ती है तुम वह सोच जगाओ जो खुशियाँ दे पर याद भी रखना की उन्हें दूसरो से कभी छिनना नहीं है 
वह सोच जगाओ जो जीना सीखा दे उस सोच को अपना बनाओ जो आपको खुशियाँ बना के जिंदगी में बार बार दे क्युकी सच्ची खुशियाँ ही एक सोच की जरूरत है 

Sunday, 28 June 2015

कविता ४०. डरना सीख लिया हमने

                                                         डरना सीख लिया हमने
चलते चलते कभी कभी हमने पिछे मूड के देखा भी है हमने जो नहीं है उन्हें ढुंढा भी है हमें उनके ना होने का अजरज तो नहीं पर कभी कभी अफ़सोस भी किया है हमने
जो नहीं लिखी थी वह किताब भी कभी कभी पढ़ लेता है दिल तो क्यों उसे रोके यह सोच कर दिल को ढूढ़ने दिया है हमने
जिसके हर पन्ने पर कोई नये अल्फाज हो लिखे इस तरह की कहानी के लिए कई बार मूड के देखा है हमने
माना की वह मंजर जिंदगी नहीं दोहराती है हमारे लिए फिर भी बड़ी उम्मीद से देखा है हमने
उस देखने में भी एक अलग मजा है क्यों की बार बार उम्मीद रखने का मजा उसमे लिया है हमने हर बार नया कोई और सपना देखा है हमने
उसे सच  होने की सोच हर बार आगे ले जाती है हमे पर उसी पल जाने क्यों डर को भी महसूस किया है हमने
अगर हम किसी सपने को ढूढ़ते है तो कम से कम उन सपनो से डरा नहीं करते थे आज तक काटो पे चलते थे उनके लिए हम पर आज जिस सपने को ढूढ़ते है उसी से डरना सीख लिया हमने
हर बार हम हर कदम पे जो मुड़ के देखते है हर बार नये सपने पाते है उन सपनो से आज तक नहीं डरे थे पर आज कल जाने क्यों डरना सीख लिया हमने
आज हसे या रोये यही नहीं समज पा रहे है हम क्यों की ख्वाबों से अपने ही बता नहीं कैसे पर डरना सीख लिया हमने
बार बार हम जो मूड के देख रहे है काश उस ख्वाब को माँग भी लेते हम पर उसी ख्वाब से डरना सीख लिया हमने
काश हम सही चीज़ सीखते है पर अफसोस है दोस्तों जिन्दगी रोने से भी पहले शायद गलती से हर अनजान मुसाफिर से डरना सीख लिया हमने



कविता ३९. साये

                                                                       साये
क्या कहे उन सायों को जो आते जाते रहते है क्या कहे उन किनारों  के साथ जो साथ हमारे हमेशा ना रहते है
हर बार नहीं समज पाते हम उस दुनिया को क्यों की साये तो उस दुनिया को जिन्दगी दिया करते है
पर हमारे लिए तो वह अंधेरा ही बने क्यों की दूसरों की दुःख में हमे नहीं लगता की हम अपनी ख़ुशी चुनते है
उन सायों से दुनिया को चाहत ही सही पर उन सायों को हम कभी चाहते ही नहीं हर बार जो हम कोई उम्मीद करते है
बस उन सायों में ही कुछ मुश्किल पाते है साये में तो अंधेरा ही है दोस्तों फिर क्यों हम उन्ही में खुशियाँ ढ़ुढ़ते है
साये तो बस अंधियारे की उपज है उनमे बता नहीं लोग खुशियाँ क्यों ढूढ़ते है वह साये जिनमे जिन्दगी है
हमने आज तक उन्हें देखा ही नहीं कहते है लोग धूप में साये जरुरी होते है पर लोग उन्हें नहीं रात के सायों को चाहते है
हर बार हम जब उम्मीद से चले तभी रातों के सायों को ढूढ़ते नहीं माना की धूप में साया ही काम आता है पर इसका मतलब हम अंधेरे में भी उसे चाहे यह होता नहीं है
अगर साया हमें बचाने के लिए हो तो वह खूबसूरत है पर दूसरों को रुलानेवाला साया किस काम का नहीं है
साये तो कई तरह के जिन्दगी में होते है पर कौन से साये जरुरी है यह समजना भी बहोत जरुरी है
 बस हर साये की चाहत तो सही नहीं होगी कुछ फूल तो प्यारी खुशबू देते है पर हर फूल को सूंघना मुसीबत में कूदना होता है
अगर बात को समज लो तो बात होती है सही पर अगर गलत बात को समजो तो जिन्दगी का एक गलत ही फ़साना बनता है
हम हर बार समजने की कोशिश में रहते है फिर भी सही तो हमेशा सही ही रहता है क्यों की जिन्दगी के हर मोड़ पर साये होते है
पर सही साया ही जिन्दगी भर हमारा साथ निभाता है हमे समजना चाहिये उन सायों को हर पल तभी तो सही साया हमें हासिल होता है
क्यों की सही साया तो वह साया होगा जिसे समजना थोड़ा मुश्किल होता है पर उसे ही अगर  ढूढे तो वह साथ देता है
अंधेरे का साया सिर्फ मुसीबत देता है तो सिर्फ साया होना जिन्दगी में काफी नहीं है दोस्तों उसे उजाले  में होना जरुरी होता है 

Saturday, 27 June 2015

कविता ३८. एक ही सोच

                                                              एक ही सोच
क्या कहे जब लोग अपने दिल की बात सुनते है बिना कुछ कहे हमारे अल्फ़ाज़ कहते है जो हमे समज सके वह
कई बार अनजान लोग भी होते है
जब कोई हमारे तरह जिन्दगी जी लेता है वह हमे आसानी से समज जाते है हर बार हम उम्मीद करते है वह हमें समज जाये जो हमारे साथ रहते है
पर यह जरुरी तो नहीं है जो हमारे साथ रहते है वह भी हमारे जैसे ही जीए अगर हमारी जिन्दगी उसी तरह की ना हो तो हम क्या बात समजेगे
जो हमारी तरह ही जीता है वही शायद हमे समजता है माना हालात अलग अलग होते है पर कभी कभी हम सोचते है की शायद
उस खुदा ने बनाई है कुछ अलग ही दुनिया पर सोच हम वही रखते है अगर सोच हम सही तरह की सोच रखे तो ही हम दुसरे को समज पायेगे
जिन्दगी के हर मोड़ पर हम वही सोच समजते है जो हम हमारी जिन्दगी में हर बार जो समजते वह अक्सर जिन्दगी को हमारी समजते है
 बार बार हम यही सोचते है की हम समजेगे दुनिया को पर हम बड़े मुश्किल से खुद को ही समजते है तो कैसे हम दुनिया को समज पायेगे
जो अपने तरह जीते है वही शायद हमे समज पाये रहते है कहा उसे कोई फर्क नहीं होता सोच वही हो तो झोपड़ा और महल अलग नहीं होता
इन्सान अपनी सोच से बनता है दोस्तों जो हमारी तरह सोचे वही हमारी तरह जिया करता है तो सिर्फ सोच ही आखिर कोई मायने रखती है
वही हमे आगे ले जाती है और संभालना सीखती है सोच तो बस हमारी एक सोच है दोस्तों जो हमारी जिन्दगी को बनती है
और वही हमे जीना सीखती है आसान नहीं किसीको समजना दोस्तों पर जब एक तरह की हो तो वह हमे छोटी छोटी अलग बातों से तोड़ती नहीं है
वह हमे कुछ उस तरह से जोड़ती है दोस्तों की हर बार हम अपनी सोच इनके साथ मिलती हुई पाते है रहने की जगह जोड़े या ना जोड़े दोस्तों ख़याल हमे जोड़ते ही रहते है 

कविता ३७. चुपचाप

                                                                         चुपचाप
हम तो हर बार कुछ ना कुछ कहते है पर कई लोग सिर्फ जिन्दगी में चुपचाप रहते है तो हर बार हम यही सोचते है जिन्दगी में कई नयी बाते कुछ लोग सोचते रहते है
जो लोग कुछ कहते है उन्हें समजना तो आसान होता है मुश्किल तो वह लोग है जो जिन्दगी में कुछ भी नही कहते है वह सोच तो बड़ी अहम है
पर वह सोच कभी ना लोग कहा करते है हर बार चुपचाप मन में सोचा करते है हर सोच के पार नयी उम्मीद है कुछ लोग उसी में जिया करते है
हम चाहते है काश हम समज पाये उन्हें पर सिले हुए होठ हमे कुछ नहीं समजाते है हम तो यही सोचा करते है की हर सोच नयी बात समजाती है
पर लोग अगर कुछ ना कहे हम जिन्दगी में क्या समज पाते है हर बार जिन्दगी में नया मोड़ पर जब हम जाते है सोचते रहते है की काश हमे लोग भी समजाते
काश वह खुलके कहते बातों को ताकि हम कुछ बाते तो आसानी से समज पाते है सारी सोच हर बार हम जान पाते है वह मन भर के दिल को ख़ुशी देते है
चुपचाप हम हर बार चलते है तो कितनी मुश्किलें हम अपने लिए हर बार सही राह दिखाते है मन में जो बात हमे हर बार ख़ुशी और आनंद देती है
पता नहीं क्यों हम मन में छुपाते है सारी बात हम पर कुछ असर कर देती है हम बस यही बात हर बार हमे ख़ुशी देते है चुपचाप छुपी सोच है
वह सोच हमारी जिन्दगी में नयी राह बताती है चुपचाप छुपी वही राह हमारे लिए काश लोग मुँह से कह देते तो जिन्दगी की कई मुश्किलें काम होती
और हम सही राह को समाज पाते काश चुपचाप रहने की जगह लोग हमें बताते वह क्या सोचते है वह लोग समजाते ताकि वह भी हमे समज पाते
चुपचाप रहने से नहीं सुलझती है जिंदगी बल्कि हर बार हम उसे बिना बजह उलझाते है हम जिन्दगी को सही तरह जीना चाहे तो कह दो जो मन चाहे
सिले हुए होठो से बिगड़ती है हमारी जिन्दगी अगर मन में सही बात हो तो उसे कहने कतराने से हम मुसीबत को बढ़ाते है 

Friday, 26 June 2015

कविता ३६. उम्मीद करो

                                                               उम्मीद करो
मुरजाती हुई कली भी हर बार हम से कहती है हम खिले ना खिले हम से खिलने की उम्मीद करो
आसमान में कड़कनेवाली बिजली हर बार हम से कहती है बारिश गिरे ना गिरे उसके आने की उम्मीद करो
हर बार हर कोई हम से कहता है बस यही की हर बार हम से कोई ना कोई तो मन को छूने वाली उम्मीद करो
जिन्दगी के कई राहो पे ऐसे काटे चुभते है की दिल सोचता है क्या जरुरी है हर बार यह कहना की उम्मीद करो
पर जब कोई मिलता है मसीहा इस दुनिया में तो वह कई अलग नयी बाते करता है पर आखिर में कहता है उम्मीद करो
जब कभी जिन्दगी में आगे बढ़ जाते है हर बार सोचते है उम्मीद का क्या करे पर हर बार कोई कहता है उम्मीद करो
हर वह चीज़ जिससे उम्मीद का कोई मतलब भी नहीं वह भी जाते जाते जाने क्यों हमे बस यही कहती है की उम्मीद करो
सोचते थे की हम सिर्फ सोच समजकर उम्मीद करेंगे पर क्या कहे उस काली से जो हर बार कहे  उम्मीद करो
उम्मीद रखना तो आसान नहीं पर हर बार जिन्दगी सोचती है बस यही के कैसे ना कहे हम उस उम्मीद को
जो हर बार हर कोई करता रहता है दूसरों से हर घडी काश कोई उस काली तरह कहे की मुझसे उम्मीद करो
पर लोग तो रखते है उम्मीद वही जहाँ उनको कुछ भी करना ही नहीं खुद से तो कोई उम्मीद नहीं पर दूसरो से बस उम्मीद करो
याद रखना दोस्तों यह राह सही नहीं जिस पर आपको मिलेंगे गलत मंजर सभी खुद से करनी है तो उम्मीद करो
दूसरों से करो तो वह गुजारिश हो क्युकी गुजारिश पूरी होती है तो अच्छी बात सही पर उस पर हमारा हक़ तो नहीं तो उम्मीद करो
पर वह खुद से करना तभी जिन्दगी में आयेगा संभलकर चलना हर बार हमसे कहते है सभी खुद से हमेशा अच्छे की उम्मीद करो 

कविता ३५. उड़ते हुए ख्वाब

                                                              उड़ते हुए ख्वाब
उन रास्त्तो में चलते है जिन्हे मन हर बार चाहे सारी दिशाए दिखती है हर मोड़ पर नयी बाते हम हर ओर
पर चलते है और हर उम्मीद में समज पाये वह फसाने जिन्हे दिल माँगे और चाहे दिल नहीं जानता किस ओर
वह जाये बस यही जानता है रास्त्ते पर ढूढ़ते है सारी सोच और सारी तरह के साये पर उन सायो में किसी ओर
नयी सोच हर बार हमने देखी सायों के अंदर दूसरी तरह की सोच जाने  क्युकी वह नयी सोच जिंदगी के ओर
नयी नज़र से देखना सिखाती है सारे तरह के रास्त्ते नये सपने दिखाते है सारे सपने हमें नयी चीज़ के ओर
हर बार लाते है हम समजते की हम जिन्दगी को समज चुके है पर हर बार नयी सोच हर पल में किसी ओर
लेके जाते है रस्तों में कई ख्वाब है लेकिन उन्हें हम सही तरह से ना पाते है जब रास्त्ते हमारे लिए और
कई चीज़े हम बड़ी खूबसूरती से लाते है कितने सारे सपने जो मन को लुभाते है वही क्यों जिन्दगी हमारे और
लेके आती है वही सपने जो हम जिन्दगी में बार बार पाते है वह ख्वाब हमें नयी तरह से दिखाते है और
उसी अनमोल सपनों में कई तरह की चीज़े मन को छू लेती है सारे खयाल इसी सपने में ही खो जाते है और
फिर जिन्दगी के नयी शुरुवात हर बार हमारे दिल को ख़ुशी और तस्सली देते है हम जिन्दगी में और
कई रास्त्तो से जाते है पर वह सारे सपने हमारे दिल को छू जाते है वह सपने अपने दिल को ख़ुशी देते है और
वही सारे सपने है जिसमे हर कई नयी चीज़े उस ख्वाब में तैयार रखते है सारे तरीके उनके सारे सपने अच्छे और
प्यारे ख्वाब जिनमे नयी सोच जिसमे हम नयी शुरुवात जिन्दगी में हर बार नयी सोच हम रखते है और
हम सब नये सपने अपने  मन से बनाते है और उन सपनों को कभी कभी ऐसे भी पंख मिल जाते है और
उनके सहारे हम उड़ जाते है की हम कभी भी सोच नहीं पाते है की अगर गिर जाये तो क्युकी वह सपने इस ओर
हमे ले जाते है जहाँ हम बस उड़ते है और उड़ना चाहते है हमारी सारी सोच हमे इतनी ख़ुशी देती है की और
कोई सोच हम दिल में ही नहीं रख पाते है तो सारी सोच हमे ख़ुशी देती है उसी सोच में मन में मासूम ख़याल आते है  और
 मन में ख़ुशी और अच्छे खयाल दिल में लाते है सारे सपने बहुत सारी ख़ुशी पाते है और मन को तस्सली दे जाते है
हम तो सिर्फ उन ख्वाबों के ओर उड़ाते जाते है हमे लगता है बस यही जिन्दगी है जिस में ख़ुशी जाते है

Thursday, 25 June 2015

कविता ३४. मंज़िल का मंजर

                                                         मंज़िल का मंजर
कुछ देखी हुई बातों का मतलब नहीं बनता कभी समजी हुई कहानी का कोई मकसद नहीं बनता
यू ही देखते हम उस किनारे के ओर जिसका कोई मकसद नहीं होता जिन्दगी में कई तराने तो है बनते
पर कुछ तरानों का हम से मतलब नहीं होता यू ही जोड़ लेते है खुद को उनसे ताकि मन को तस्सली हो
पर कितनी भी कोशिश करे आसमान हमे हासिल नहीं होता उड़ना है तो उड़ पर दिल इतना ही उड़ना
जितना तेरी किस्मत में लिखा है वरना कुछ भी हासिल नहीं होगा जिन्दगी ने जो दिया है उसे संभालना
इस तरह नहीं चला तो आगे बढ़ना मुमकिन नहीं होगा जिन्दगी तो हमे कुछ देती है और कुछ  छिन लेती है
पर आगे बढ़े गलत दिशा में तो आगे चलना मुमकिन नहीं होगा सारी बाते जो हम हर बार कहते है
वह जरूरत पे दिल को समजाना मुमकिन नहीं होगा तो वक्त रहते ही रोक लेते है इस दिल को क्युकी
यह दिल काफी वक्त सपनों में रह चूका है और रह ले तो इस दिल को समजाना बड़ा मुश्किल होगा
जो अपने पास है उसमे ही खुश रहे दोस्तों तो ही जिन्दगी को ख़ुशी से जीना मुमकिन होगा
जो शमा रोशनी दे इसे दूर से देखते ही  रहे तो ही अच्छा है दोस्तों क्युकी उसे छूले तो हाथों का जलना ही मुमकिन होगा
संभलकर चलने में ही अक्सर जीत  होती है दोस्तों ज्यादा की लालच से रोना ही सिर्फ रोना हासिल होगा
जब पा चुके थोड़ी खुशियाँ तो क्यों ना उन्हें ही समेटे दोस्तों दिल कहता है शायद ज्यादा माँगने से कही जो पाया है वह तो चुपके से गुम नहीं होगा
जो मिला है उसमे ख़ुशी अक्सर होती है दोस्तों पर जब ज्यादा दिखता है तो क्या उम्मीद रखना मुनासीब होगा
हमे सोच के चलना है हर राह पर हर मोड़ पर क्युकी कितना भी हम कहे हमे कुछ नहीं मिला है पर हमे जिन्दगी से हर मोड़ पर काफी हासिल होगा
उसे खोने की आहट से दिल कुछ इस तरह से डरता है दोस्तों की सोचता है कोशिश का मंजर नहीं होगा
पर फिर वही दिल सोचता है की कोशिश नहीं की तो उपरवाले की देन है यह जिन्दगी उसमे मंज़िल का मंजर कैसे हासिल होगा 

कविता ३३. जिन्दगी का तोहफा

                                                          जिन्दगी का तोहफा
हर बात अगर पूरी हो जाती तो कितनी आसान हमारी जिंदगी हो जाती पर फिर उसे जीने में भी शायद इतना मजा ना होता इसलिए ही खुदा तूने अधूरी अधूरी यह जिन्दगी बनाई
हर मोड़ पर हम जो इसे पूरा करना चाहे तो भी यह पूरी ना हो पाये ऐसी मज़बूरी बनाई
हम सोचते है की हम जो है उसमे रह लेंगे पर तुमने ही इस में नयी प्यास जगायी बड़ी आसान जिन्दगी तो थी बनाई
पर उसमे तुमने नयी राह बना दी जब सीधे ही जा रहे थे पर तुमने वह मोड़ है लाये जिन्होंने हमारे लिए नयी मंज़िल थी बनाई
हर राह पर हम चलते है वह आसानसी लगी जब तब तुमने उसमे नयी प्यास ना जगायी सीधी थी जिन्दगी हमारी तूने टेडी मेढ़ी क्यों बनाई
हर राह से हम गुजरे कुछ इस तरह से के हमारे समज में ना आये जो सीधी राह हमारे लिए मुश्किल क्यों बनाई
हम सोचते रहे बस यह की जिन्दगी में सही राह हमारे लिए माना की तुमने चुनी है पर तूने वह राह आसान भी नहीं बनाई
जिन्दगी हर मोड़ पर जो नयी चीज़ तूने लायी हम उसे देखते ही रह गये क्या यह हमारे लिए सही है या फिर क्या यह तूने हमारे लिए बनाई
जब छोटीसी चीज़ मागते थे तो वह तो तू नहीं दे पायी अब इतनी बड़ी बात क्या तूने हमारे लिए की और हमारे लिए बनाई
आसान रास्त्तो पे तो तुमने मुश्किलें ही दिखायी तो क्या तू सचमुच हमारे लिए अब इतनी खुशियाँ है लाई
हर बार इस तरह से सोचते रह गये हम और तू आगे बढ़ती जाये जिंदगी तेरे तोहफों को शायद हम समज ना पाये
तू हर बार जब रोकती थी हमने उस पल सिर्फ तेरा इन्कार देखा है पर आज तेरे तोहफों से कभी कभी बिना बजह हम कतराए
तू हमे समज लेना जिन्दगी क्युकी हम तुम्हे आसानी से ना समज पाये तूने ही तो हमे बनाया है तो ही अब हमे सजाए 

Wednesday, 24 June 2015

कविता ३२. सही मोड़

                                                                 सही मोड़
कुछ लोग समजते है और कुछ लोग समज  नहीं पाते है जिन्दगी में हर बार नयी राह अपने लिए लाते है
कुछ लोग हमारे आँसू में रोते है पर कुछ तो ऐसे भी होते है जो हसते  है हर बार हम चाहे वही नहीं होता है
कभी किस्मत चमकती है और कभी कभी इन्सान अपने मुकदर को रोता है पर जिन्दगी से सबसे मुश्किल तो सवाल होता है
जब लब्ज आधे अधूरे से होते है कुछ तो कहते है और कभी कभी चुप भी रह लेते है क्युकी हर आधी बात तो है
बस एक ऐसा मंजर जिस पे इन्सान हमेशा रुकते है थोड़ी देर फिर चल देते है आ फिर वह बात पूरी भी है
पर टूटे सपनों की आवाज की बजह से हम उसे न सुन पाते है हर मंजर पे कई लोग मिलते है कुछ हसाते है
और कुछ चोट देते है उन चोटों की बजह से शायद कई बार हम और आप सही आवाज को ही दबा देते है
काश कोई हमे समजाये कहा सही लोग रहते है क्युकी हर घर में दो तरह के किनारे एक ही मोड़ पर मिलते है
अच्छा और बुरा इतने करीब दिखे के जिन्दगी सच्चाई को समजना हम हर राह पर बहोत मुश्किलसा पाते है
रोशनी की तलाश तो है हर किसीको पर कुछ लोग उसे सब के लिए और कुछ लोग उसे सिर्फ अपने लिए चाहते है
हर बार जब हम किसी किनारे पर चले दोनों और हमें अलग नज़ारे है मिले हम हर बार नयी चीज़ खोजा करते है
हर बार नयी सोच ढूढ़ते है पर कुछ लोगों को इससे एतराज़ नहीं पर कुछ लोग तो इस पर भी एतराज़ करते है
किनारो में कई मोड़ हम समजते ही नहीं और कई मोडो को सिर्फ डर के ही अनदेखा किया करते है
जिन्दगी के राह पर कई मोड़ है सही और कई मोड़ो पर है उम्मीद खड़ी पर दुःख तो है की ऐसे भी सही मोड़ है
जिन पर हम चल सकते थे पर डर के चलते  क्यों हम उन्हें भुला देते है हर बार जो जिन्दगी ने कहा वह हम सुनते नहीं है
पर काश उस सही राह पर हम सुना लेते पर जब चारो ओर से गलत राह दिखे अक्सर लोग सिर्फ सीधे चलते है
और इस कोशिश में है की  सब कुछ हो सही वही सही मोड़ भुला देते है तो राह पर डरना ही गलत है दोस्तों पर फिर भी हम सब डरा करते है  

कविता ३१ . पत्तो की आवाज

                                                                पत्तो की आवाज      
हरे पत्ते सरकते उनकी आहट हमे भाती है उस आवाज से मन को तस्सली देती है उन पत्तो की आवाज मन को
बहोत ख़ुशी देती है
वह पत्ते जो मन को ख़ुशी देती है सारे पत्ते उनके पिछे कुछ ना कुछ छिपाते है पत्तो के पार जो कुछ भी होता है
उन पत्तो के पार हर बार कुछ ना कुछ छुपा होता है क्युकी पत्ते हमे हर बार ख़ुशी और तस्सली देते है
पत्तो के दुनिया में हम नयी बात  जरूर पाते है पत्ते जो भी हमारे मन को ख़ुशी  और शांति देते है
पत्तो से हमे कभी कभी परिदों की आवाज भी सुनायी देती है पत्तो की दुनिया में हम हर बार नयी ख़ुशी पाते है
छुपे हुए परिंदे हमारी आवाज मधुरता से सुनते है और परिंदो की मधुर आवाज हम हर बार सुनते है
उसी तरह दुनिया में मासूम आवाज वही परिंदे भी सुनाते है हर बार उनको सुनकर हम मन को बहलाते है
सारी आवाज मन की मासूम सोच दिल को तस्सली देती है मन को ख़ुशी हर बार और प्यारी सोच देते है
पत्ते आज भी वही है कल भी वही थे तो हमारी और हर किसीकी कहानी जानते है बताते नहीं किसीको पर जानते है और समजते है
हर सोच को हमारे आसानी से सुन पाते है पत्तो की खूबसूरती वह हर बार जानते है हम बस यही चाहते है
की वह हर बार सुने हम को पर वह कभी कभी ही मानते है क्यों की कुछ पल्लो को वह अपनी बात समजाते है
कुछ कुछ पल्लो को खूबसूरत देती है पत्तो में से कोई आवाज हम हर बार मधुर और नाजुक आवाज सुनाते है
पत्ते सरसराते है और मधुर आवाज हर बार पाते है वही आवाज जो हम हर बार उन्हें सुनाते है
पर कभी कभी वह हमें भी सुनाते है हर बार उनकी आवाज सुनने के लिए हम खिड़की में दौड़ कर जाते है
बार बार सुनते है उनको पर समज न पाते है पर फिर भी उन्हें सुनते है इसी उम्मीद पर के एक दिन उन्हें समज पायेगे आखिर वह तो सिर्फ पत्ते है
उनकी जबान अलग है यह तस्सली तो मन में पाते है क्युकी आज कल तो इन्सान भी कुछ कुछ इस तरह से कहते है
की उनकी जबान इतनी गलत और अलग लगती है की लगता है हम परिदों को समज लेंगे , पत्तों को समज लेंगे पर इन्सान को ना समज पाते है 

कविता ३० . परिदों की उड़ान

                                                             परिदों की उड़ान
आकाश में उड़ते हुए परिदों से हमने पूछा क्या उन्हें पता है हम किस ओर जा रहे है हर बार जो उड़ते है 
 सारे परिदों की उड़ान हर बार उपर ले जाती है वह परिदे आकाश को ही हर बार छूते है उन्हें देखा है 
हर बार हमने उड़ते हुए चारों ओर उड़ते हुए हमने परिदों को उड़ते हुए और देखा है आसमान में जाते है 
उन्हें हर ओर घूमते हुए बिना किस रोक के हर दिशा में रोज जाते और उसी तरह लौटते हुए 
और वापस एक सही राह हर बार वह है पाते काश आकाश के  परिदे  वह सारी दिशाये हमे भी दिखाते 
घूमते घूमते हुए पर वह हर बार अपना रास्ता कितनी अच्छे से  है जानते पर हमने देखा है इन्सानों को 
हमेशा रास्तों को ढुढते हुए काश वह बता पाते रास्तों को परिदों की तरह हमारे लिए पर अफ़सोस यही है 
हमारे दिल के लिए परिंदे तो ढूढ़ लेते है  पर हम नहीं ढूढ़ पाते सही राह अपने घर  के लिए हमे तो बस है 
तलाश उन चीज़ो की जो खुशियाँ दे हमे कुछ पल के लिए भुला देते है हम हमेशा की ख़ुशी कुछ पल की ख़ुशी के लिए 
काश के वह आकाश ही हमे समजाये कौनसी राह सही है हमारे लिए हम वह मुसाफिर है जो ढूढ़ते है 
सही राह सिर्फ एक पल के तस्सली के लिए ना महल माँगते है ना तलाश है किसी ताज की हमारे लिए 
बस तसल्ली से बैठना चाहते है किसी डाली पर मन के सुगुन के लिए पर कोई ना समज पाये हमे 
हर कोई बस गिन रहा है इनाम हमारे लिए जब हसी सबसे बेहतर है तो भी सोचते है हर बार यही चीज़ है हमारे लिए 
तोहफा ढूढ़ते है हसी का  इनाम पाते  है सिर्फ दिखावे के लिए काश लोग समज पाते सबसे बड़ा इनाम दोस्त होता है जमाने के लिए 
बाकि कुछ भी मिल जाता है पर सही साथी नहीं मिलता जो राह दिखा दे क्युकी हम परिंदे नहीं जो राह जाने बिना मदत लिए 

कविता २९. हर बार जिन्दगी में

                                                                हर बार जिन्दगी में
कितनी बार हम जिन्दगी को समजे पर हर बार उस किताब में हम नये नये पन्ने है पाते पर हर बार
हर सोच को हम है पाते जिन्दगी ने बनाये है कितने तराने जब हम हसते है वहा हम रोने के भी तराने हर बार
हम मन से बार बार यही है पाते हर बार हम यही सोचते है रहते की जिन्दगी में कई किनारे हम हर बार
हम है पाते जिन्दगी में कई बार हम अलग तरह की सोच  हम है पाते जिन्दगी में  नयी सोच हर बार
हम है पाते क्युकी जिन्दगी आसान नहीं है जिन्दगी में कई तरह के तराने  जिन्दगी में हम है हर बार
कभी ना कभी हम है पाते जिन्दगी में कई मोड़ पर हम नयी सोच और नयी बाते है पर आँसू भी पाते है हर बार
जिन्दगी में कई बार वह रंग हमे है मिलते जिन्हे  सोचकर हम खुशियाँ है हम पाते  सोचते है हम शायद हर बार
हम जिन्दगी को नहीं समज पाते क्यों की जिन्दगी के आँखों में हम कुछ नयी खुशियाँ और आनंद पाते है हर बार
जिन्दगी की आँखों में आजतक ना देखी थी  इतनी सच्चाई हमने किसी वक्त में कभी वह सच्चाई पाते है हर बार
जिन्दगी के हर ओर हम कुछ नयी चीज़ हम हमेशा अपने लिए पाते है नयी सोच हम ख़ुशी मन से पाते है हर बार
पर फिर भी मन में उठते है कहाँ से जिन्दगी लाती है खोज के इतने हसी सपने टूटे मन को मलम मिलाता है हर बार
जो सोच भी ना सके इसी कल्पना मन में उठती है क्यों  बार बार जो अनजान है वह जाना पहचाना लगता है हर बार
काश जिन्दगी आये और दे इन सवालों के जवाब क्यों की इस खेल में तो हम कुछ भी नहीं समजे है हर बार
हम जानते है की समज जाते है समजदार पर अगर हम नहीं समजते तो काश जिन्दगी आ के  हमें  समजाये
इस बार
क्यों लगता है जैसे कोई है खड़ा मदत के लिए कोई है खड़ा मुसीबत में हमारे पर दिखता नहीं कोई भी हर बार

Monday, 22 June 2015

कविता २८. है जरुरी

                                                              है जरुरी
हर बार तू करिश्मा दिखाये यह जरुरी तो नहीं कभी तू कर देता है पर कभी हमे करना भी है जरुरी
पर मन नहीं मानता के यह है तेरी मज़बूरी सोचता है काश तू समज पाता है यह कितना जरुरी
पर कभी कभी लगता है हम आसानी से कर लेते  हम ही बैठे रहते है और बनाते है उसे मज़बूरी
जो काम हम चंद लम्हों में कर लेते उसी काम को करना मुश्किलसा होता है जब हर मोड़ पर जरुरी
तेरा साथ लगता है पर फिर हम सोचते है यह हाथ जो चलते है वह तू ही चलाता है तो क्या है मज़बूरी
हर बार जो आगे बढ़ जाते है हर बार अपने मन से हर बार सोचते है आगे बढ़ जाते है पर उसमे भी उसका साथ है जरुरी
हर बार जब सोच से आगे बढ़ते है वह सोच तेरी देन है जो है बहोत जरुरी तेरी हर मदत  पर आगे  जाते है पर क्या उस बात को समजना नहीं है जरुरी
हमे भी कुछ करना है धीरे धीरे आगे बढ़ना है हर बार तेरी मदत को समजना है हर बार समजना है जरुरी
हम हर मोड़ पर सोचने लगे है की जिन्दगी में आसान रास्त्ता है जरुरी पर उस मुश्किल मोड़ पर भी हम चलते है तो उसका साथ होना है जरुरी
जब हम हसते है हमारी हँसी में वह खड़ा है जब रोते है वह आँसू पोछता है पर फिर इंसान की ख़ुशी कोसते है हम
क्या यह समजना नहीं है जरुरी
हर राह पर हर मोड़ पर चलना है मज़बूरी तो हर मोड़ पर चलते जिस पर दिखते है कई मंजर उन्हें समजना है जरुरी
हर बार हम जिस राह पर चलते है उस पर चलना अहम है हमारे लिए जिन्दगी की हर राह पर सही तरह से चलना है जरुरी
तो खुद से चलने की मजबूरी को क्यों ना समजे हम क्यों की हम खुद से नहीं हर  चलते है बस उस खुद की मदत से क्युकी वही तो है हमारे लिये जरुरी  

कविता २७. रोकते है हम

                                                           रोकते है हम        
आँखो में जो सपने है उन्हें रोकेंगे न हम किस्मत से जो मिला है उसे टोकेंगे न हम 
बस यही कह दे तो काफी है किस्मत के लिए क्युकी जो भी मिले उस पे बहोत सोचते है हम 
हर बार यही कहते है कही यह गलत तो नहीं बस यही सोच कर सपनों को रोकते है हम 
कई बार उन आँखों में कई ख्वाब हमने देखे है पर हर बार जाने क्यों उन ख्वाबों को रोकते है हम 
ख्वाब एक नदिया है उसे बहाने तो देते है हम पर उसे समुंदर से मिलने पहले ही क्यों रोकते है हम 
इस हर ख्वाब की चाबी में किस्मत है बसी फिर भी उन्हें पाने से अपने आप को क्यों रोकते है हम 
अगर टूट गये तो भी मन को तस्सली तो होगी कोशिश ही जरुरी है पर उसे ही जाने क्यों रोकते है हम 
हर बार इस भरम में की वह टूट न जाये उस खूबसूरत कश्मकश को जाने क्यों रोकते है हम 
जब हवाओ ने  कहा हम उड़ के यू ही जाना है उस हवा को मंजूर करने की जगह टोकते है हम 
जब उड़ सके है उन बादलों में तो उन बादलों के तूफानों से डर के खुदको रोकते है हम 
हर बार जो उड़ चले वही हवा लगे हमे प्यारी फिर भी उस हवा को घर में आने से रोकते है हम 
कोई हमे समजाये यह कसूर क्यों करते है हम पर अनजाने में ही सही पर कभी कभी उन्हें चुपके से बुलाते है हम 
हर मोड़ पर दिखती है खुशियाँ सिर्फ उन्हें सोच कर तो फिर उन्ही मासूम आँखों से बच्चे की तरह देखते है हम 
न रोक पायेगे उस सुबह को जो रंग देती है हमारे जहाँको क्युकी जो खुद उस उपरवाले ने है बनाई उसे कैसे रोकेंगे हम 
जो ख्वाब उसने सजाये वही धीरे धीरे देखते है हम न रोक सके उसे क्यों की उसे टोकना मुमकिन है पर उसे कैसे रोक सकते है हम
उसने जो बनायीं उसे मंजूर करगे तो ही उन हवाओ में उड़ सकते है तो आजकल उसकी बात एक दो दिनों में मानते है हम

Sunday, 21 June 2015

कविता २६. पथ्तर का मजबूत घर

                                                     पथ्तर का मजबूत घर 
काच के  महलों में रहनेवाले पथ्तर फेका नहीं करते यह बात लोग अक्सर कहते है लेकिन किया नहीं करते
जब पथ्तर मिल जाये तो दूसरों के बारेमे सोचे बिना  फेक देते है लोग इसे पहले खुद के बारेमे भी सोचा नहीं करते
इनको ना होश होता है ना समज होती है बात की दूसरों के रिश्तों में आग लगानेवाले अपने घर के बारे में कभी  सोचा नहीं करते
काच सा नाजुक होता है हमारा दिल का महल उस पर पथ्तर फेकने से पहले अपने घर की परवाह नहीं करते  
शायद उन्हें अहसास ही नहीं होता अपने घर में भी काच का ही झरोका है होता वरना अपने लिए ही वह लोग चुपचाप रह लेते 
पर ठिक से सोचे तो इसमें भी क्या बुरा है जो टुटा था वह अपने घर का नाजुक हिस्सा था अब मजबूत हम घर बनाया है करते 
काच को भी पिंजरों में बांधा करते है तो किसी पथ्तर से हमे अब फर्क नहीं होगा क्युकी अब हम शिशो में नहीं दीवारों में है रहते 
माना की बड़ा खूबसूरत था पर नाजुक था वह झरोका उसके टूटने का अफ़सोस क्या जिस पर हम कभी भी यकी नहीं कर सकते 
घर में सिर्फ खूबसूरती ही नहीं काफी मजबूती भी अहम है मजबूत घर ही तूफानों में बिना टूटे खड़े है रहते  
अच्छा है पथ्तर ने हमे बता तो दिया हम बिना सोचे समजे किस तरह के खूबसूरत पर नाजुक से घर में थे रहते 
मजबूत हो जो जिसे पथ्तर ना तोड़ पाये इस तरह के घर ही खूबसूरत है  होते पर जब तक कोई पथ्तर ना हम कहा है समजते 
की हमे मजबूती की जरूर है पथ्तर फेकने से पहले लोग सोचा नहीं करते बस फेक देते है और कोने में है खड़े रहते 
काश उन्हें कोई समजाये पर वह लोग समज नहीं सकते तो यही वजीब होगा के हम शिशोंकी जगह पथ्तर के मजबूत घर क्यों न बना लेते 

कविता २५. अल्फाज बदल जाते है

                                                             अल्फाज बदल जाते है    
कहते कहते कभी कभी बात बदल जाती है अल्फाज बदल जाते है लोग हर चीज़ बदल सकते है पर एक बात ना बदल पाते है
वह है हमारे दिल की सोच कितना भी उसे जुट लाये पर उसे बदल ना पाते है हर सोच पर कोई ओर बात कहते है
पर लोग हमे ना बदल पाते है
हर बार जब हम आगे बढे इन्सान बन के चले उसे किस तरह से यह लोग जुट ला पायेगे हर बार उसी राह पर तो हम चलते है
सिर्फ लब्जों से इन्सान बनते नहीं इन्सान तो उनके दिलों से बनते है चाहे कितना भी जुट लाये लोग सच्चे तो हमेशा सच्चे ही रहते है
पर क्या करे लोग कहा समज पाते है उनके हिसाब से चलते है और दूसरों को चलना चाहते है पर क्या जरुरी है की वह हमे समाज पाये
या यही काफी है की हम अपना कारवा चला पाये हम आगे बढ़ते है और कभी पिछे मुड़ते है पर यह सिर्फ हम हमारे लिए करते है
सही तो है हासिल हमारे दिल को यू की वही हर बार मंज़िल बन के हमे मिलता है सही हासील नहीं आसानी से पर सिर्फ उसके लिए चलते है
हमारे अल्फाज बदल लेने से बता नहीं उन्हें क्या हासील होगा आखिर में सही तो सही ही साबित होगा पर फिर भी  कुछ लोग यह बात किया करते है
दूसरों के दुखों में हँसा करते है पर हमे क्या करना है उनसे आखिर उस जिन्दगी में हम तो बस अपनी राह चलते है
कितना भी बदल दे वह अल्फाजो को आखिर हरकत से ही हम इन्सान समजते है वक्त लगता है पर भी सब समज तो जाते है
हम क्या बात कर रहे थे और क्या बात वह सुनाते है क्युकी हरकत से लोग जुट पकड़ पाते है और आखिर वह हमे समज जाते है 

Saturday, 20 June 2015

कविता २४. कुछ कदम

                                                                  कुछ कदम                                            
कुछ कदम हम चलते है फिर रुक जाते है हर बार हम यही जिन्दगी में करते है हर बार जो कदम हम आगे बढ़ाते है
वही कदम हमारे लिए कुछ ना कुछ पाते है पर फिर भी कदम आगे बढ़ाने से हम डर जाते है वह कदम कभी कभी 
जो हमारा साथ देते है वही कभी पिछे मूड जाते है क्युकी शायद उन कदमों को वह हासील ही नहीं जो हम चाहते है 
और हर बार माँगते है कदम तो हर मोड़ पर चल दे लेकिन क्या वह कुछ भी हासील कर पाते है उन मोड़ पर चलाना 
कभी हमारे लिए मुमकिन ही नहीं क्युकी हर मोड़ पर हम जन्नत नहीं पाते है कदम तो आगे बढ़ाना है दोस्त पर किस ओर चलना है 
यही मुश्किल है कदम तो बस चलते है हर ओर से पर क्या हर बार वह सही ओर पे चलते है कभी हम आगे बढ़ते है 
कदम दर कदम जब हम आगे बढ़ते है पर जरुरी है की आगे बढ़ने की सही दिशा तो मिले जब हम जिन्दगी में आगे चले 
जरुरी है वह कदम सही राह पर चले कही गलत चल पड़े तो फिर  मुड़ना भी जरुरी होगा जिस कदम पे चल दे हम 
वह कदम सही ओर ले जाने के खातिर ही जरुरी होगा जाये किस ओर यही सवाल है इस जिन्दगी का हर कोई अपनी राह चुनता है 
हम तो बस यही दुआ करते है की हर किसीकी राह बस राह रहे गुनाह ना बने हम तो बस चल दिए है बिन सोचे समजे 
इसी हरकत कभी कोई ना करे मंजिल तो हम नहीं चुनते है हम दोस्तों पर राह तो हम ही चुनते है माना की किस्मत दिखती है 
पर कश्ती को तो हम ही चलाते है अगर गलत मोड़ पर मुड़ जाये तो भी उसे हम ही तो रोक सकते है 
तो कदम हमारे आगे बढ़ते रहे पर बस सही उनकी मंज़िल हो जब कोशिश करेंगे तो ही यह मुमकिन होगा क्यों की जिन्दगी इतनी आसान नहीं की सब हासील हो 

कविता २३. ख्वाब जो मंजिल बने

                                                         ख्वाब जो मंजिल बने
हर बार नयी सुबह हमे कुछ तरह के सपने हमे दिखते है हर बार हम जब आगे बढ़ते है तो वह सपने
हमे हर बार उम्मीद देते है उस जगह जहाँ से हम वह ख्वाब पाते है वही कई सपने हम देख पाते है
वहाँ सपनों का बड़ा खजाना होगा पर उन में से कौनसा सपना सही होगा एक सपने में ही हर बार
कई मोड़ दिखते है कई सपने उसी ओर हमे मिलते है सपनों के उस सफर में हम कुछ सपने चुनते है
पर मुश्किल तो यह है हाले के लिए की वह समज नहीं पाता है किस सपने को वह चाहे हम आसान सपने
को कुछ इस तरह से चुनते है की हमे  जिन्दगी में कोई मंज़िल तो मिले पर वही सपने बरबादी की
कगार पर हमे हर बार लाते है उन सपनों में कई बाते इस तरह की होती है जो आसान नहीं होते है
कई तरह के सपनों से हम आसान तरह के सपने हमे दिखते है पर उन सपने में कुछ सही है पर
कुछ गलत से लगते है कई तरह के सपने आते है और जिन्दगी में जाते है पर कुछ सपने दर्द बन जाते है
कुछ को तो खोने का गम भी नहीं पर कुछ अंदर से हमे रुलाते है सपनो के कई मोड़ पर हम हसते है
और मुस्कुराते है पर जब कुछ ख्वाब टूट जाते है कई सपनों में से हम चुनते है कुछ कभी कभी लगता है
हम यही गलत करते है अगर हम छोड़ दे मुकदर पर क्या सही और क्या गलत यह सोचना हम छोड़ दे
उसके ऊपर तो हम सही सपने चुन लेते हम समाज जाते हर बार अपने आप को क्या सही है
यह हम समज तो पाते है कई मोड़ पर सपनों में जो बात हम सपनो में चाहते है इस से हम सच में भागते है
क्युकी आसान नहीं लगता वह सपना हम मुश्किल ख्वाब को न अपनाते है हम सिर्फ एक बात चाहते है
कई सपनों में कुछ बात सही है मगर आसान सपनें भी आसान ना होते है सपने जिन में जिन्दगी है
वह सच में कभी कभी बहोत मुश्किल होते है और मुश्किल ख्वाब कभी कभी आसानी से मिलते है
तो जिन्दगी बस यही सिखाया है हमे ख्वाबों  को ना बाटो दो हिस्सोमे जो आसान लगे इसे अगर पा न सको
तो मुश्किल के ओर देखो शायद यही मुमकिन है की वही हासील हो हमे  जो मुश्किल लगे वही आपकी मंजिल बने 

Friday, 19 June 2015

कविता २२. कश्ती

                                                                   कश्ती                                                     
जो हमने कहा था क्या उन्होंने समजा हमें लगता है वह अलग था पर वाह उन्हों ने कितना सही समजा
अक्सर जिन्दगी में हमने देखी है हर बात हमारी सही नहीं समजी जाती पर आजकल खुदा कुछ ऐसा
मेहरबान है की बात सही में बदल जाती है मुसीबत तो जिन्दगी में आती है जाती है पर जब कोई बात
को इस कदर सही से समजे तो दिल को ख़ुशी होती है हम कुछ कहते है और बात बदल जाती है हम तो
सिर्फ कश्ती को चलाना चाहते है और वह तूफ़ान से गुजर जाती है कभी नहीं हम सोचते है की हमारी बात
कभी इतने मायने रखेगी पर जब कश्ती तूफानों से गुजर जाती है तो अहसास यह ले आती है की शायद ऐसा
भी हो सकता है की हम किसीको हौसला दे तो वह इन्सान लढ भी जाये अच्छा लगता है जब अपना जीतता है
हमे उसके जीत में ही अपना सपना दिखता है हमने कभी न सोचा था के इस तरह की जीत होगी के हमने तोड़े थे पत्थर तो
हमारी हार होगी और हम जब सिर्फ कुछ कहे तो उस में जीत होगी यह तो है करिश्मा उस ईश्वर का
जिस के हाथ में हमारी हार और हमारी जीत होगी क्युकी कभी इसने कहा नहीं है की कब हमारी हार और
हमारी जीत होगी हार को अपना के उसे इतने पास रखा हमने अपने दिल के की अब दिल में इस तरह की चोट
होगी
के जीत पर अजरज है और हार में ही सच्चाई दिखेगी पर क्या होता है हमारी सोच से जिन्दगी में उस उपरवाले
साथ हमने जो रखी है वही सोच चलेगी हर राह में हमेशा सच्चाई की जीत होगी हर कदम पे नये तराने
और हर कदम में नयी सोच होगी जब हम आगे बढ़ जाये तो जिन्दगी में नयी उम्मीद लिखी होगी जो
हमने सोची ना होगी ऐसी नयी कहानी भी होगी हम  जो डरते है उस वजह की निशानी भी ना होगी
कोई हमे डराये और हम डर जाये ऐसी कहानी न होगी क्युकी अगर आज कोई अपना जीता है तो उसकी जीत
में भी
हमारे जीत की निशानी तो होगी क्युकी खुद जीतने सिर्फ इन्सान जीतता है पर दूसरा जीत जाये तो हमारा भगवान जीतता
दूसरों को जीत में ही जीत उस खुदा ने दिखाई जब अकेले जीते तो सिर्फ तन्हायी ही पायी तो अपना जीत जाये
उसी में ख़ुशी पायी जब वह कश्ती तूफान को पार कर गयी तो लगा सौ हारो के बाद हमने हमेशा के लिए सिर्फ जीत पायी 

कविता २१. जिन्दगी एक किताब

                                                         जिन्दगी एक किताब
काश के कभी हम जिन्दगी को समज पाते काश की जिन्दगी एक किताब नहीं सिर्फ एक पंक्ती बन जाती
हम आसानी से आगे जिन्दगी में आगे आते अगर जिन्दगी को अहम आसानी से समज पाते
पर फिर सोचते है की हर बात अगर इतनी छोटी बन जाये तो उसे बड़ा करने में ही हमारी सारी उम्र निकल जाती
और फिर से वह एक किताब बनती जिस में मन की ख़ुशी नहीं पाते  हमारे लिए जिन्दगी बड़ी अहम हो जाती
फिर लगता है जिन्दगी बड़ी अच्छी बन जाती अगर वह अपने मर्जी से चलती पर फिर सोचते है की
कई बार जिन्दगी में हम गलत बात मागते है हम खुद ही नहीं समज पाते के हम क्या चाहते है की
फिर हर बार हमने देखा है की जिंदगी बड़ी दिलचस्प किताब है जिसके हर पन्नें पर कोई कहानी लिखी है
कभी कभी लगता है यह किताब क्या बुरी है जो किस्मत में लिखी है हर बार जब हमने जिन्दगी में देखा है
सारी खुशियाँ हमारे जिन्दगी में आये सिर्फ इसी वजह से क्यों की हम उसे नहीं चलते है कई बार हमने देखा है
हम गलत ही मागते है हम नहीं समज पाते क्या सही है हमारे लिए जब जिन्दगी में हम आगे बढ़ जाते है
जब वह किताब उस उपरवाले ने लिखी हो तो ही हम उसे सही पाते है हर पन्ने पर लिखी हुई चीज़ों पर है
कई बाते हम जिन्दगी में है हर बार कई ओर हम है पाते जिन्दगी के हर मोड़ पर खुशियाँ हर ओर हम है पाते
उस किताब में हर बार हम कुछ न कुछ ख़ुशी हम हर ओर से हम है पाते किताब में कई तरह की कहानी
हम हर बार है पाते पन्नों पे वह खुशियाँ लिखी है जो हम कभी सोच भी नहीं पाते क्यों सिर्फ देखे
उन गमों को और जिन्दगी से भागे जब जिन्दगी के नजरों में हमारी कई तरह की उम्मीद जागे
तो यह जिन्दगी है जिस में हर किताब जागे जिसमे हमें कई खुशियाँ जागे हर पन्नें पर ख़ुशी जागे
जिन्दगी जब उस नज़र से देखी तो लगता है वह किताब ही सही है वह  जिन्दगी उस पर हर बार नज़र अटके
क्यों की वही तो जिन्दगी है जिस को हर बार हम पूरे दिल से माँगे जो उसने लिखी किताब है उसे ही हम चाहे 

Thursday, 18 June 2015

कविता २० . मासूमीयत

                                                         मासूमीयत
क्या कहे की कभी कभी किसीकी हरकत हमे हसती है बच्चे का बचपना याद दिलाती  है 
सच कहे तो बड़ा होना चाहते है लोग पर हमे बच्चे सी मासूमीयत बहोत भाती है हर बार यही सोचते है 
क्यों लोग इस तरह से मासूमीयत का मजाक उड़ाते है आखिर उस खुदको प्यारी  है वह तो इन्सान को भाती है 
हर बार हम जो सोचते है वह सोच हमे नहीं भाती है जो मासूम सोच मन को आगे ले जाती है 
मासूम सोच ही सही है पर शायद जिस तरह से हम उसे चाहते है लोग अक्सर नहीं समजते है 
वह मासूम दिल की बाते जमाना नहीं समजता पर वह खुदा है उसे हर बार नहीं समजता है 
मासूम दिल की चाहत हमे हसाये रुलाये पर जमाना शायद उसे ना समाज पाये हर बार और एक सोच है 
हम उस मासूमीयत को नहीं समज पाये बच्चे भी बचपने से भागते और हर बार बड़े होना चाहते है 
मासूमीयत जो हमारे मन को भाये खुदा उसे हर बार बनाये क्युकी उसमे वह ताकद अंदर है 
जो हर बार हमे भाये पर हर बार जब हम देखने है कोई नज़रोंमे वह मासूमीयत पायी है 
उसी ओर हमारी नज़र हमने घुमायी है पर जाने क्यों कभी कभी लगता है कई बार वह मासूमीयत जो बच्चे ने खोयी है 
वही मासूम नज़र बड़ो में पायी है हर बार हम सोचते कितनी प्यारी बात हमने दुनिया में पायी है 
जब निगाहों में हम वह ख़ुशी पाते है हर बार हम यही सोचते है हर बार यही सोचती है 
पर वह मासूमीयत कही खोना जाये यही सोचकर हम डरते है क्युकी दुनिया की राह में सिर्फ मासूमीयत खोना सीखते है 
मासूमीयत ही वही ताकद है जो हमे भाती है पर ज़माने को ना लुभाती है इस लिए वह अक्सर खो जाती है 
पर हमे बस यही दुनिया की यही आदत नहीं भाती है नहीं चाहते तो अनदेखा करते  पर वह उसी से जलती है 
और अकसर उसी को दिन रात सताते है पर खुदा की यह रेहमत है की  मासूमीयत हर बार जीत जाती है 

कविता १९ . ज़माने के लिए

                                                            ज़माने के लिए
कभी सोचता है यह दिल के कोई उम्मीद रखे पर फिर डरता है कही वह ना टूटे हम यह बात तो समजते ही नहीं
क्यों डरता है यह इतना उम्मीदों के टूटने से क्यों काच का बन गया है यह दिल जो हर बार छोटीसी आहट से भी टूटे 
उसे मजबूत बनाना था ज़माने के लिए पर शायद उसे परिंदे भी आसानी से तोड़ गये मजबूत तो ना बन सका ये 
पर इतना आसान ना बनता तोड़ने के लिए हमे ही तो इसको समजाना था के यह समज जाये ज़माने को 
आसानी से वह तोड़ रहा है उन बजाओ के लिए जो हर बार बड़ी आसन सी होती है वह बड़ी आसान है ज़माने के लिए 
कोई दोस्त भी धोखा दे तो बड़ी बात बनी हमारे लिए पर ज़माने के लिए कुछ भी न था सिर्फ दोस्त ही था जो मिला था हमे 
सिर्फ एक छोटे फ़साने के लिए हम आगे बढ़ जाते है पर सोचते है कैसे दोस्त मिले थे हमे जिन्दगी में आगे बढ़ने के लिए 
पर जमाना कहता है सिर्फ दोस्त ही तो था क्या बड़ा हुआ रोने के लिए हमने जो बड़ी समजी वह छोटी बात है ज़माने के लिए 
पर बड़ा फ़साना है हमारे लिये हमने तो बड़ी सोच रखी थी दोस्ती के लिए उन्हों ने सोचा वह कुछ भी नहीं और फिर बुलाया दिखावे के लिए 
अगर दोस्ती अहम नहीं है तो फिर आगे बढ़ जाते बिना बुलाए हमे किसी बहाने के लिए पर दिखावा तो जरुरी था ज़माने के लिए 
कैसे अजीब दोस्त हमने पाये है कई जो दोस्ती करते है सिर्फ दिखावे के लिए उस बात क्या मतलब है जिन्दगी में 
 सच्ची नहीं है बस है दिखावे के लिए हम कभी दिखावे के लिए जीते ही नहीं हसते होगे कभी कभी दिखाने के लिए 
पर दोस्ती कोई खेल नहीं जो कर ले हम बस दिखावे के लिए वह दोस्त भी कोई दोस्त है जो दोस्त बने सिर्फ ज़माने के लिए 
दोस्त तो वह होता है जो अपने साथ हसता है और रोता है मुश्किल ही सही उसका मिलना पर हम नहीं करते दोस्ती दिखावे के लिए 
हम करते है उसे दुसरे को समज ने के लिए और इस उम्मीद पर करते है की हमे भी कोई मिले समजने के लिए 
दिल का हल बताने के लिए ना की सब के सामने दिखाने के लिए के कितने दोस्त हमने बनाये ज़माने से जताने  के लिए  

Wednesday, 17 June 2015

कविता १८. हसने की आदत

                                                      हसने की आदत
तेरी हर बात पे हम मुस्करा देते ऐसे भी कई दोस्त ज़माने में थे पर जिन्हे फ़सानो में खो दिया हमने
क्युकी ज़माने के गमो में खो गये वह लोग हसना  तो इस कदर भूल चुके थे उन्हें देखा तो
इस तरह लगा के उन्हें हसे ज़माने हो गये हमे तो रोने की आदत थी पर जिन्हे हसने की आदत थी हमें
दुःख है की वह हसना भूल गये जो जीने को हसी मानते थे आज फुरसत में भी थोड़ा हसना भूल गये
हम जो हसते है तो भी अजरज से देख के हमारी ओर  वही हमे हसने की बजह पूछने लगे
जो कहते थे हसना ही जिन्दगी है आज हसने की बजह ढूढ़ने लगे है और  हर बार हमने देखा है उन्हें
छोटी छोटी मुश्किलों पे रोते हुए क्या सीखना था उन्हें इस जिन्दगी से और गलती से वह  गलत सीख लिये
बार बार मिसिबत में जो जिन्दगी ने डाला उन्हें वह हार से समजोता कर के बैठ गये बात निकले
तो बात करे रोने की हसना जैसे किनारे पर छोड़ चुके पर हमने तो देखे कई मुक्काम ऐसे जिन पे
हमने नये लोग दिखे जो आँसू को भी मशाल बनाकर जिन्दगी से लढ गये वजह बता नहीं  है हमे
पर हम कैसे ही लोगो में अपना दोस्त ढूढे मानते है दोस्त को छोड़ते नहीं पर जो सिर्फ रोना समजाते  है हमे
कोई समजाये हसना उन्हें समजाये कैसे कुछ लोग कभी हसते है और कभी रोते है वही सही दोस्त होते है
पर कुछ लोग दुःख से सिर्फ रोते है वह भी दोस्त हो जाते है पर जो हसने की आदत को बदल के रोने लगे
वह भला कैसे दोस्त होते है क्युकी वह रोने को ही सही समजते है और हमे हर पल सिर्फ रोने के लिये
समजाते है रोता तो हर कोई है दोस्त पर उसे सही समजता नहीं उसे हसी में बदलने के लिए हमारे
सारे दोस्त तरसते है पर कुछ लोग समजते है की रोना ही सही है तो उन्हें क्या समजाये
हम तो सिर्फ यही समजते है की हर बार हसी बड़ी अहम है रोने पर कोई तोफाह तो मिलता नहीं है दोस्तों
तो फिर हम हार को क्यों अहम मानते है हमे ढुढ़नी होगी मंजिले कई पर हम हार को ही इशारे समझते रहे
तो कैसे जीते गे कभी अगर हम हार को ही गलती से अपनी किसमत मानाने लगे
कोशिश सिर्फ एक लब्ज नहीं एक तपस्या होती है जो भगवान भी तो देते है फिर हम इन्सान क्यों कतराते है
समजो के यह राह आसान तो नहीं पर चाहे तो पार कर लेंगे अगर आप और हम साथ हो दोस्तों तो कई मुश्किलों से भी लढ लेंगे 

कविता १७. वह चीज़

                                                                 वह चीज़
हर चीज जो हम चाहते है वह हासिल हो हमे यह जरुरी तो नहीं पर हर मोड़ में हम देखे की वह चीज
जो हम चाहे वह हमारे लिए अगर जरुरी नहीं है तो उसे पाना हमारी मज़बूरी नहीं है वह चीज
जिसे हम चाहे मिल जाये हमे तो शायद हमे ख़ुशी भी हासिल नहीं है क्युकी एक बात तो सच है वह चीज
शायद हमारे लिए इतनी अहम भी नहीं है जो जरुरी है वह बात हमे हासिल हो जाये यही चाहते थे वह चीज
फिर हमारे लिए अब क्यों जरुरी बनी है हर बार यह सोचा है मंजिल तो हमारी बस यही है वह चीज
तो सिर्फ दिखावे के लिए जरुरी है बार बार हम सोचते है तो फिर हमारे लिए वह चीज क्यों जरुरी थी
जब देखते है कई चीजो को कुछ देर बाद तो लगता है की वह चीज़ उतनी जरुरी  थी पर जब मांगी थी
तब इतना लगता था की वह बहुत जरुरी लगी थी मांगी थी जब कोई चीज़ तो सोच कर ही मांगी थी
पर अब लगता है आस पास कई चीज़े पड़ी  है जो घर में तो है हमारे और हमने जिद्द से हासिल की थी
पर अफ़सोस लगता है वह इतनी जरुरी नहीं थी शायद वह किसी ओर की जरूर भी होगी पर हमारे लिए जरुरी नहीं थी
कभी उसे अहम मान के लाये थे पर वह उतनी अहम नहीं थी हम सोचते की हमे उनकी जरूरत है लेकिन
शायद हमे उनकी कोई जरूरत नहीं थी हम जब सोच के चले थे हमारे लिए वह अहम हमे वह अहम ही लगी थी
पर आज इस मोड़ पर लगता है उनकी जरूरत नहीं थी किसी और को खोजे हम जिसके लिए वह अहम हो
यही सही होगा क्युकी हमारे लिए तो वह अहम नहीं थी वह चीज़े तो है हमारे पास पर उसकी कोई अहमियत नहीं थी
पर जब हमने ढूँढा किसीको जो उन्हें चाहता था तब वह चीज़े अहम लगी अच्छा लगा इस दिल को की किसीके लिए तो वह अहम थी
तो उस चीज़ को हमने दे दी और मन तस्सली हुयी की आज तो हमारे घर में बस वही चीज़े थी जो हमारे लिए अहम थी
जो चीज़ ना जरुरी उसे लाने की गलती तो हमने कर दी पर उसे लौटा के तस्सली है की हमारी गलती हमने समाज ली
सिर्फ चीज़ क्यों है रखनी अगर वह किसी के लिए जरुरी हो तो जब वह हमारे लिए कभी भी ना अहम थी 

Tuesday, 16 June 2015

कविता १६. किसके लिए

                                                               किसके  लिए
हर मोड़ पर कुछ दिखता है पर उसे खुद से  ना जोड़ ले काश हम समज सके वह इशारे ना थे हमारे लिए
कोई भी कुछ कहे अक्सर देखा है हमने उसे जोड़ देते है खुद से हम खुदा ने इतनी बड़ी बनाई है दुनिया सबके लिए
तो क्यों हर बात हम  मोड ले अपने ओर उसे बनाये सिर्फ अपने लिए इतनी बड़ी दुनिया में कई सारे मंजर है हमारे लिए
फिर क्यों हम हर बार कोसे अपने आपको हर हरे हुए मंजर के लिए और हर खोये किनारे के लिए
हर मोड़ पर कयी बाते हो चुकी है पर कभी लोग कोसते है किसी को भी उनके गलती के लिए
हम उस पल क्यों मानले की हम गलत थे जब हम जानते है यह आसान तरीका है बचने का ज़माने के लिए
जो गलत है वही गलत होगा क्या फर्क होता है पर कोई यह भी समजे की हम क्यों उस दिल को रुलाए सिर्फ उस ज़माने के लिए
जिस फुरसत नहीं थी मिली जब हमने चोट खायी थी तो अफ़सोस करने  के लिए  कभी हमारी गमो में रोने के लिए
जमाना तो जी रहा है बस अपनी धुन में उसे कहाँ  फुरसत है किसी के गमो में रुकने की रोने की किसी के लिए
कभी तो सोच लो अपने लिए दोस्तों, नहीं तो बस गालियाँ सुनगे दूसरों के लिए राम के लिए सुनना पर आजकल लोग सुनते है रावण के लिए
जिस के लिए करते हो तस्सली तो कर लो लढ रहे हो तुम किसके खातिर और किसके खिलाफ किसके  लिए
कही अपनों से ही न लढ लो किसी पराये के लिए हर बार हम जहाँ जाते है चोट खाते है तो हम खाए अपनो के लिए
हर बार जो बोले सारी बाते समज जाये अपनों के लिए दुश्मन न बनाओ सिर्फ अपनो  में सिर्फ किसी सपने के लिए

कविता १५. बस ख़ुशी

                                                                बस ख़ुशी
जिन्दगी में कई बार हम आगे बढ़ते है उन मोड़ो पर जिनकी हमे कोई उम्मीद नहीं हर बार जब हम चलते है
कई बार वह राहे कुछ इस तरह की होती है की हमे उन पे चलना ही नहीं पर फिर भी यह जमाना चाहता है
बस हर घडी हम उसी राह पर चल दे जिस पे चलने की हमे तम्मना ही नहीं कुछ छोड़ के अपनी सोच चल देते है
पर हम तो उन चलनेवालो में से नहीं हम तो बस वही राह चुनते है हर घडी हमे चलना उन राहों पर है
तो वह राह होगी वही जिसे हम चाहते है क्युकी कोई राह आसान होती नहीं तो चुनो बस वही राह जिसे हम दिल से चाह सके
आखिर यह दिल ही तो साथ देता है हमारी हर घडी क्यों उसे समजाये और मजबूर करे चुनने को वह राह जो चाह न सके
हर मोड़ पर काटो पर चलना है उसे क्यों ना कभी कभी हम उस दिल की सुने चले उस राह पर जिस राह को चाहे
और शिकवा ना करे
क्युकी बिना उस दिल के हमे कुछ हासिल ही नहीं अपना दिल तोड़ कर जीते तो जहा क्या जीते उसे तो हार भली
चाहत को समजो उस दिल की वह चाहता है की वह अच्छे से रहे हँसता रहे और उसे दिखे सारी दुनिया भली
पर हम उसे समजाते है की जिन्दगी में सिर्फ काटे होते है आप कभी तो उसे फूल भी दिखओ ना यही दिल कहता है हर घडी
फुरसत में कभी सोचा करो जिन्दगी क्या दे गयी हमे पता है अगर दिल से पूछो गे तो वह जवाब देगा यही बस ख़ुशी और बस ख़ुशी 

Monday, 15 June 2015

कविता १४. हमारी जिन्दगी

                                                       हमारी जिन्दगी
हस के हम जो गुजार ले वह हमारी जिन्दगी थी  पर रो के गुजार रहे है वह हमारी जिन्दगी है
नहीं दोस्त हम सिर्फ नहीं रोते कभी कभी गुस्से से भी अपनी जान को परेशा है कर देते
जो हसने के लिए है उसे रोने को है दे दी कितनी हसी थी तो फिर क्यों हमने यू बिघाड दी
जब हस के चल सकते थे किनारे हमे मिल सकते थे पर हमने मुसीबतों के पहाड़ों में क्यू गुजारी
यह हमारी जिन्दगी जो अभी भी पास है हमारे क्यू अभी तो उसे हस के हम गुजरे कही
यह ना हो के बाद में सोचे की यू ही अफ़सोस में गुजर गयी ये जिन्दगी कभी रोने में और कभी
गुस्से में गुजर गयी हमारी पूरी जिन्दगी कभी फूलों को देखे कभी किनारो पे घूमे और कुछ मजे ले
कुछ उस तरह से गुजर जायेगी हमारी यह जिन्दगी अफ़सोस तो होता है के हमने कुछ गलत तरीके से
कुछ मोड़ पर गुजारी
है पर अभी जिन्दगी में कई मोड़ बाकी है उन मोडो में हमे कई मोके मिलेंगे जिन्दगी में कई बार हमे कई खूबसूरत नज़ारे मिलेंगे
आज हम कह दे की ख़ुशी से गुजरेगी तो आज भी बदल जायेगी हमारी यह जिन्दगी ख़ुशी से गुजरे
तो सही राह पे गुजरेगी हमारी यह जिन्दगी हम तो बस यही समझते है की हस हस के गुजरे
इस तरह की होगी हमारी जिन्दगी हर राह पर खुशियों की बारात बन के दिल को हसती है जिन्दगी
हमे लगता है की अगर हम चाहे तो हस के आगे आकर खुशियाँ दे जाये इस तरह से भी होती हमारी जिन्दगी
जब आगे चलेंगे तो नज़ारोमे भी खुशियाँ दे जाये इस तरह के मंजर होगे कई जो सचमुच में हमे
ख़ुशी दे जाये इस तरह से बनाये जिन्दगी इस तरफ उसे मोड दे की जन्नत बन जाये हमारी जिन्दगी
आखिर यह सब से बड़ी अनमोल देन है हमारे लिए हमारी है प्यारी और सबसे दुल्हरी हमारी जिन्दगी 

कविता १३. सच

                                                                   सच
सब सोचते  रहे है पर  यह जरुरी नहीं लगता जब हार रहे हो तब आप सच हो तो हार का गम नहीं होता
गुस्सा भी आता है मन जोर से चिल्लाता है चाहता है यह सब कहना पर फिर भी वह  गम नहीं होता
जो कहता है काश हम दूसरी राह पर चलते जो सही राह पर चलता है उसे राह बदलने का भरम नहीं होता
हम सोचते है हर पल सही राह पर चलते है तो मंज़िल भी क्यों नहीं मिलेगी पर सच कहे तो यह भरम नहीं होता
जो सच को चाहते है वह सच के चाह में ही खुश है सच तो एक इस तरह की चीज है जिस में गम नहीं होता
वह तो हर गम की दवा है क्युकी जानता मन का खुदा है ये सच तो सच है वह जूठ नही होता
तो जो सच को चाहता है वह उस चाहत में इतना खुश है उसको उस चाहत का कभी अफ़सोस नहीं होता
जो आधे राह पर सच को छोड़ के भागे जो आधे राह पर सच को कोसे वह कभी सच का साथी नही होता
चाहत को आधे राह पर भुला दे वह इस चाहत की राह का कोई भी किस्सा या फिर कोई हिस्सा नहीं होता
सच तो वह ताकद है जिस पे हर कोई  चल नहीं सकता जो उस आग पर चलते है उन्हें जलना तो है होता
पर उसे से  वह कभी बरबाद नहीं होते है आग में तप के वह निखरते है आग में उन्हें हर बार जलना है होता
सच तो मुश्किल होता है जो न समज पाये उसे सच की राह पर चलना बड़ा मुश्किल है होता
वह चल तो पड़ता है पर राह में मुसीबतों का मंजर तो होता है जो उसे ना समज पाये वह उस राह के काबिल नहीं होता
सच को समजना आसान नहीं होता क्युकी सच जो  समजता है  वह सच को हासिल करने के लिए हमेशा है लढता
जो सच के लिये कभी लड़ नहीं पाये उन्हें के लिए तो सच बस सपना है वह कभी हासिल नहीं होता
बिना मेहनत के जो मिल जाये वह हमने अक्सर देखा है सच का सिर्फ एक साया होता है सच नहीं होता
जो जल के हासिल होता है वही सच होता है तो बिना मेहनत के कभी किसीको दुनिया में सच हासिल नहीं होता 

Sunday, 14 June 2015

कविता १२. उन वादियों में

                                                उन वादियों में
हम ने भी आजकल कुछ अजीब से सपने देखने लगे है अनजान राहों पर कभी कभी रुकने लगे है
जहा जाने से कापती थी रूह हमारी उन्ही वादियों से दोस्ती का सोचने लगे है कब तब डर को यही रखे है
अभी उसे भूल जाने को चाहते है हर बार हम यही सोचने लगे है की हम जिन्दगी वह मौका देते है
जिस पर हर बार यकी ना किया करते है वह जो जसबात जिन्हे हम ना समज पाये है
क्यों ना उन्हें ही मौका दे इस सोच पर हम उन्हें वादियों के परिदोने हमे इस तरह से पुकारा है
हमे दिल की सोच पर एक इशारा लगे की शायद वह वादिया हमे कुछ पुकार रही है और
फिर चुपके हम जहाँ गए थे कभी अभी उन्ही वादियों में जाना भाने और सुहाने लगा है
वह सारी वादी कुछ अलग सी लगी उनकी आहट कितनी थी नयी हमे नहीं लगता है
वादियों में सुन्दर अहसास था बस यही उन वादियों में खूबसूरत और खास लगता है
सारी वादियों में हर जगह हमे कशिश सी दिखी आजकत हमने ना देखी थी वह कसक है
क्या हम डर के रुक जाए यही पर उन वादियों ने हमे वह मौका दिया ही नहीं हर बार है
कहता हमारा दिल यही वही वादिया हमारी उम्मीद है पर यह सोचने को ना रुके है
हम कभी क्यों की वादियों में जाये उन वादियों ने यू पुकारा हम को की हम सब कुछ भूल गये है
हर बार बस उस वादियों में जाते है कही ये एक नशा तो नहीं पर नशा तो उसे कहते है
जिस में गुनाह हो और जिसमे कुदरत की देन हो वह वादिया कभी गुनाह होती नहीं है
जो उन्हें समज ना पाये उन्हें छोड़ के हम हर बार उन वादियों में जाते रहे है जो सही है
वही जान पाते रहे है दोस्तों  तुम भी खो जो इसी वादिया कोई ताकि सच्चाई तुम्हारा जानना जरुरी है

कविता ११. कभी ना कभी

                                                      कभी ना कभी
हर बार मैंने गुस्से से देखा तेरी और पर फिर से हँसना सिखा देती है बड़ी गहरी चीज़ है तू जिन्दगी
तुज से नाराज भी ना रह पाये कभी
हर छोटी सी बात में तो हसा देती है तू तो तेरा आँसू भी भुला देती है तू जिन्दगी तेरे रंग कई पर हर रंग
हमे तेरे भाता है कभी ना कभी
जिद्द है हमारी हम जियेगे तुम्हे अपने दम पर हर बार बस कहते है यही पर तू चुपके से ले लेती है
वह सारा  हक्क हम से कभी ना कभी
अफ़सोस तो होता है तभी पर तू फिर से माना लेती है हमे तभी हम तो तेरे लिए सिर्फ एक बच्चा है
जो करता है जिद्द कभी ना कभी
पर हमे बता की तू क्यों हमारी बात मानती नहीं तेरी सुनते है  हम हर घड़ी तू ही  तो समझदार है ना 
माना कर हमारी बात कभी ना कभी
पर तू तो बस अपना ही किया करती  है हर बार हमे परेशान किया करती है यह भी कोई बात हुई
आसान रखा कर ये जिन्दगी कभी ना कभी
 जीत जाये तो मानते है होते है हासिल मुकाम कई पर बार बार यह मुसीबते जरुरी तो नहीं
माना कर तू भी हमारी बात कभी ना कभी
थक जाते है तेरे इन्तहानोसे से सभी अगर तू  आसान बन के दिखा दे हम सब को इस दुनिया में
कुछ मोड़ पे और कभी ना कभी
हम किसी को बताये की तू कभी आसान भी थी अब तो सब हस देते है जब हमने  यह बात कही
तू फिर आसान बने के दिखा कभी ना कभी
ता की लोग किया करे हमारा यकी  क्यों की जिन्दगी आसान नहीं कहते है आजकल सभी
तू आसान भी थी दिखा दे कभी ना कभी

Saturday, 13 June 2015

कविता १० आजकल

                                                            आजकल
हर बार जो हम कुछ कहते है आप चुपचाप से रहते है पहले लगता था आप साथ हो पर आजकल
हम आपने सायों पे भी शक करते है
मानते है की शक सही बात नहीं पर अब किसी पे यकी कर ले यह ज़माने के  हालत  नहीं तो हम आजकल
तब तक  ना यकी करते है
जब तब कोई आ के ना लब्जों में कहे पर हर कोई अपनी बात कहे यह भी मुमकिन नहीं तो आजकल
हम सिर्फ सोचते है
की उस खुद पे ही रखेंगे यकी क्युकी उसने भी कोई राह फुरसत में बनायीं होगी जिस पर हमे आजकल
भी चलाना होगा मुमकिन
है हमे उस राह पर अभी भी यकी कोई कुछ भी कहे पर हम उस राह से दूर न रह पायेगे कभी आजकल
होते है  शक कयी  हम सोचते है
हर मोड़ पर दिखती है हर बार कोई बात नयी काश के हम उस बात को समजा पते पर आजकल
हमने देखा है सभी हर बात को जानने लगे है
हमारे अल्फाज जिस दिल को छू ना सके उस पे वक्त गवाना हमे मंजूर नहीं पर हर बार आजकल
देखा है हमने लोग बदलते है
पर जो हर मोड़ पर बदल जाये क्या उन पे वक्त गवाना  मुनासिब होगा पर हमने देखा है आजकल
हम सोचते ही नहीं इस बात पर चलते है
हर दम बिना सोचे क्युकि पहले तो इंसान पर होता था यकी पर हमने देखा है हर बार आजकल
हर बात पर सिर्फ खुद का  भरोसा  करने लगे है


कविता ९ राह

                                                      राह
काश जिन्दगी में कोई आसान सा रास्ता होता जिस पे कोई तूफ़ान न बसता होता
काश उस रस्ते में हम खेल सके वह खेल कयी काश फुरसत तुम्हें मिल जाती थोड़ी
काश उस फुरसत में तूने हमे सुना होता ना देखते उन दीवारों की ओर ना दिल में कोयी
डर होता अगर तूने कभी हमे सुना होता तो शायद दिवारों को ना बताया होता
पर फिर सोचते है की अब दिवार भी हमें समजने लगी है उनसे बात करने में भी
अब आने लगा है यकी पर काश जब हसते थे तब तुम्हे फुरसत मिली होती
काश उस वक्त तू हमारी और हस के देख लेती तो हमने तेरी मुसीबते भी ले ली होती
पर अब ना है हम हस के सहे गे उनको हर और से अब बगावत होगी हम मागेंगे खुशियाँ तुज से
हासिल करेंगे उन्हें पर्वत चीर के क्युकी अब ना इंतज़ार करने की हमे फुरसत होगी
कभी तेरे  पास इस ओर ना देखने की फुरसत थी अब हमारी और ना रुकने की फुरसत होगी
अब तो हम उस तरह से कुछ दौड़ेंगे की सोचगे भी नहीं क्या हमे जीत हासिल होगी
क्युकी अब तो हमे एक राह मिल चुकी है हम दौड़ेंगे बिना सोचे की उस पर मंज़िल होगी या ना होगी
चाहे कुछ भी हो अब कदम रुक ना सकेंगे कभी क्युकी रुकने से उन्हें कुछ हासिल ही नहीं
अब तो बस दौड़ेंगे बिना सोचे हर कही के क्या तू साथ देगी या नहीं क्युकी अब तेरे साथ की
हमे कोई उम्मीद ही नहीं क्युकी मंजिल तो नहीं पर कम से कम राह तो हासिल हो गयी
तो उसको खोना मुमकिन नहीं है तो हमारी साथी हमारी राह बनी है हमारी मंजिल नहीं 

Friday, 12 June 2015

कविता ८ आवाज

                                                          आवाज
फूलोंने कुछ सुनायी मन में कभी कभी आयी वह बात बड़ी अजीब थी जो हवा ने चुपके बताई
बता नहीं क्यों उन्होंने वह बात दोहरोई क्युकी  बड़ी अधूरी सी वह कहानी थी जो इन्होने बताई
कभी कभी लगता है कोई दास्तान उन्हें बतानी थी हर मोड़ पर हमे समजनी थी पर शायद ना बताई
जल्दी क्या हमने सोचा क्युकी फूलोंकी वह खुशबू हमे बहोत भायी थी किसीने उसमे मिट्टीकी खुशबू थी मिलाई
पत्तोकी सरसराहट हमे हर पल ये बताये चुपके कोई कोयल शायद गाना हलकिसी आवाज में गाए
सावन की उस आवाज को हम हर मोड़ पर आसानी सुन पाये हर मोड़ पर उसे कोई ना रोक पाए
गाड़ी की आवाज के उपर भी उस कोयल ने बड़े प्यार से गा गा के उसकी मधुर आवाज हमे सुनाई
हम यही समजे की अगर हम थान ले तो दुनिया में हमारी आवाज कोई ना कभी रोक पाए
नन्ही सी कोयल अगर उस गाड़ी से भी लड़ जाए तो हम में क्या कमी है जो हम अपनी आवाज ना सुना पाए
पत्ते भी ना हारे किसी मोड़ पर भी कितनी बार फेको वह हवा के सहारे आँगन में फिर से आए
हमने कितने  मजबूत छाते चूनके थे ले आये फिर भी दोस्ती कर के पवन से बारिश हमें भीगा के जाए
उन्हें ना कोई रोके तो हमे कोई क्यों रोक पाए जब हम सही है तो हम क्यों ना कुछ मांगे और क्यों ना उसे पाए

कविता ७. किनारे

                                                        किनारे
हम समजते है वही सही साथी है हमारे जो हमारे दुःख को समजे और अपनी मज़बूरी में हमे पुकारे
जिन्दगी है कितनी छोटी उसे एक दुसरे को रुलाने में क्यों गुजरे जब के हसके निकल जाएगी ये
अगर हम एक दुसरे को दे सहारे पर हर मोड़ पर गिनते है हम लोग बस यही कौन जीते कौन हारे
हमे सब का साथ देना है पर हम सिर्फ लोग  चुनते है और फिर सोचने है की हम जिन्दगी क्यों हारे
जिसने हमे बनाया शायद उसने भी ना सोचा होगा के इस तरह से कभी हम भी करगे इंसानियत
पर वह तो शायद सब जानता होगा उसी लिए तो उसने हमारे लिए कही ना कही थोड़े है सहारे
हम ठिक से ढूढेंगे तो हमे मिल जाएगे वह किनारे जिनकी हमे तलाश होगी वही बन जायेगे सहारे
अगर हम अपना परया छोड़ के देखेगे इस जिन्दगी को देख पाते तो कभी ना रहते गर्दिश में वह किनारे
हर और रोशनी होती हर और होते बस उज्जाले हम अगर सही राह पर अभी भी चले तो पास है किनारे
जो खो गया है उस पर सोचनेवाले काश की समाज पाते जिन्दगी में आगे ही हमे  ढूढ़ने है किनारे
पिछे तो बस वह बात है जिस में हम कभी मंज़िल ना पा सके अब  आगे ही हमारी उम्मीद हमे पुकारे
आगे जब चलेंगे मुश्किल भी साथ होगी पर मुश्किलों से ही तो हमे हासिल होगे वह सारे किनारे
हमारा दिल हर बार यही पुकारे एक दुसरे का साथ देने से ही तो हासिल है हमें सारे खूबसूरत किनारे

Thursday, 11 June 2015

कविता ६ बूँद

                                                         बूँद
पहली बारिश ने हमें समजाया है की हर सुबह फिर हमे खुशियों का अहसास देगी
उसकी हर बूँद हमे छू के चुपके से है कहती वह हमारे बचपन को हमेशा अपने पास है रखती
उस हर बूँद में हमने फिर से हर चीज को पाया उस लिए हमे नहीं लगता वह हमारा कुछ भी खोने देगी
हर बूँद में अहसास है उस बचपन का उसे छूने से हमे तस्सली और ख़ुशी हासिल होगी
वह बूँद हमे छूने पर हमे बता है देती के हर बूँद की भी कोई कहानी होगी जो उसने चुपके से सुनी होगी
वह बूँद जिसमे कोई मतलब है छुपा हर बार हमे कुछ बात आसानी से हमारे दिल को बताती होगी
उन बुँदोने जो लिखी है वह नये मतलब की हर बात में कोई कहानी लिखी और समाजायी  होगी
बुँदोमे लिखे हुए हर बात को काश पढ़ने की हम में क़ाबिलियत होती तो हमारे पास रोज नयी कहानी होती
पर यह भी कोई बात होगी की बिना सोचे हमारी कहानी यूही बन के हमारे पास होगी
हमारी कहानी तो हमारी कल्पना का एहसास होगी ना की किसीकी जिंदगी की किताब होगी
दुसरो के दर्द को हम नहीं बेचने है ए बूँद तू जो हमे बताती तो दिल में रखते वह ना कभी किताब होती
हम अपने दिल में वह कहानी रखते शायद किसी के लिए मददगार होते पर उस पे कभी हमारी कहानी ना होती
हम दूसरो की ख़ुशी में हँसाने वालो में से है पर दूसरो के गमो को बेचकर कभी भी हमारी कहानी न होगी
जब हम तेरे दोस्त है तो हम बता दे तुज को की हम कभी दूसरो का गम बेचते नहीं
उसने दिया है सब कुछ हम को दूसरो के आँसू पर जो बने वह इमारत हमारी जरूरत नही
हमे नहीं लगता है के यह सही है ए बूँद की हमे  दूसरो की गलतियाँ बतानी जरुरी होगी
क्युकी हमने कोशिश तो की थी पर जब गनने बैठे तो हमने अपनी गलतियाँ कुछ ज्यादा ही गिनली

कविता ५ उलझन

                                                                उलझन
हमने उन निगाहों को देखा था इस तरफ आते हुए पर अब शक है की कही वह धोका होगा
फर्क तो नहीं पड़ता यह समजाया मैंने पर फिर लगता है के शायद कोई दर्द तो उठता होगा
मेरे दिल में चाहत तो थी बस उलझन सुलझे पर उस किताब ने बस  को ही जगाया होगा
तो छोड़ के क्यों न आगे बढ़े क्युकी क्या करे बताओ हमे उस किताब का जिसे पढ़ना मुश्किल होगा
हर बार हम यूही  आगे बढे की तो समाज न पायेगे उस किताब का क्या मतलब था उसका क्या करना होगा
हम उस मोड़ पर काश उस निगाह को समाज पाते हम पर फिर सोचते है की उनमे सिर्फ सपना होगा
जो हमने देखा था कभी खेल ही खेल में उनमे कोई अपना नहीं सिर्फ सपना बसा देखा होगा
जब यह सोचकर आगे बढ़ जाते है हम की वह कोई मतलब ना था पर फिर से दिल पूछता है क्या यह सही जवाब होगा
कही हम इतना तो नहीं डरते  है दिल की चोट से पहले ही हमारा मलम इस दिल के लिए हाजिर होगा
दर्द से जो डरता है वह हमारा दिल है तो शायद उसे मुश्किल से कुछ हासिल होगा
फिर भी हम जानते है की कोशिश जरुरी है क्युकी ऐसा न हो के हम अपना खयाल रखते चले और दुसरा कोई घायल होगा
अनदेखी  भी कर दे वह नजर पर तस्सली तो हो कोई घायल परिंदा ना होगा
क्युकी हम चोट खाने से हमेशा डरते है पर उसका मतलब यह नहीं दुसरे को रुलाना मुनासीब होगा
हमे यकी  तो है की हमने सपना देखा पर फिर भी फुरसत में तस्सली करना हमारे दिल के लिए मुनासीब  होगा

Wednesday, 10 June 2015

कविता ४ अधूरी कहानी

                                                                अधूरी कहानी                                   
कुछ लब्ज अधूरे है पर उन्ही से शायद कहानी बने कुछ बाते अधूरी है पर शायद वही कोई निशानी बने
वक्त ना रुका था आपके  लिए ना हमारे  लिए रुकेगा कभी  कारवा आपके  लिए चला था अब हमारे लिए चलेगा
पर बात वह नहीं है के  कारवा किसके लिए होगा बात तो वह होगी की आपको यहाँ पर ऐसा क्या दिखा था
के आप इस तरह से मगरूर हो लिए हमे तो यहा  पर सिर्फ मजबूर ही मिले हमने कभी एक राह पर सुना था
मजबूर की बजाह है पर मगरूर की नहीं आप आज उस बात को दिखा के जा रहे है पर हमे उस बात का
अफ़सोस होगा आपने जिन्हे रुलाया आज उनका भी एक कारवा होगा हम समाज ना पाये किसीको रुलके
आपको हासील क्या होगा जीतना माना की आपकी चाहत भी होगी पर क्या आप यह ना समाज पाये
की बाद में हारना आपकी मजबूरी भी होगी अधूरे लब्जों की जब कहानी पूरी होगी हारना आपकी एक
मज़बूरी होगी
पर हम समज ना पाते है क्या तब भी आप में यह मगरूरी होगी हम जानते है आप में वह होगी
पर उस पल हमे परवाह ना होगी क्युकी जब कहानी पूरी होगी आपकी हरकतों से कोई निशानी भी ना होगी
पर हम समाज पाते है कोई कैसे सोच पाता है कैसे किसीको अपनो को रुलाना भी इतना भाता है
पर शायद आपको लगता है की सब कुछ आपका है बस अभी पर जरा रुकिए अभी आपको देखने है मंजर कयी
यह तो बस शुरवात थी बस कुछ लोगो के कहने से वह आखिर बनता नहीं अधूरी किताब पूरी होती है
किसी के कहने से उसे लिखना खुदा छोड़ता नहीं तू जिसे माने उसी ईश्वर ने लिखी है जो कहानी
उसे अधूरी छोड़ कर वह जाता नहीं सिर्फ किसीके कहने से अफ़साना रुकता नहीं क्युकी यह जंग जो है आपकी
हमसे नहीं उससे है जिसे रोज पूजते है आप क्युकी यह कहानी तो उसकी लिखी है हमारी नहीं 

कविता ३ कुछ आँसू

                                                                 कुछ आँसू
कुछ आँसू हमे रुलाते है पर हमने देखे है लोग कई जो कहते है हमे तुम्हे बस यही आँसू क्यों रुलाते है
हम समज ना पाते है कभी वह लोग क्या चाहते है हमे किसीके गम का तो अफसोस है दोस्तों पर उन्हें तो किसीके आँसू भी न रुलाते है
कुछ गम पर रोये और कुछ पे नहीं पर हम तो वही करते है जो हम दिल से चाहते है हर मोड़ पर दिल रोया करे तो क्या खुशियों को भी रुलाते हम जाते है
कभी रोता है कभी हँसता है यह दिल अपना तभी तो जिन्दगी में संभल पाते है इनके कहने पर रोने लगे तो दोस्तों ये लोग तोफो में सिर्फ आँसू ही लाते है
हर सुबह हम इसी उम्मीद पर जागते है की आज आँसू से मुलाकात न हो और ये लोग उन्हें हऱ दम हमारे  साथ चाहते है
दूसरो के आँसू पर खुद तो आराम से अपने कमरो में हँसते है पर हर चेहरे पर अफ़सोस का नकाब चाहते है
जो सच दिखाते है उनके खिलाफ हर बार बात करते है हर पल इन्सान रोये ये जरुरी नहीं न दोस्तो पर कुछ लोग आँसू का दिखावा करते है
और हमसे भी वही चाहते है हम गम को साथ रखते नहीं पर कभी कभी ऐसा लगता है की ये गम भी खुशियों की तरह हमें चाहते है
पर फिर भी हमे अफ़सोस है हमे ए गम हम तुम्हे नहीं चाहते है हमने वादा किया है खुशियों  से उन्हें हम साथ देगे  तो हम तुम्हे नहीं चाह पाते है
हमने कई वादे किये है जिन्होंने हमे खुशियो से जोड रखा है दोस्तों तो गम पर हर बार ना रो पाते है
कभी कभी हमारी कोशिश है दोस्तों क्या हम उन्हें खुशियो में बदल पाते है हर मोड़ पर रोना  हमे मंजूर नहीं है
क्युकी दोस्तों हम तो सिर्फ हँसना चाहते है और रोते रहे हर पर तो कैसे खुशिको ला पायेगे कभी क्युकी बचपन से हमने सीखा है
बस यही जो  गम में हसते मुस्कुराते है वही औरो के जीवन में और अपने जीवन में खुशियाँ लाते है
तो आँसू हमारी गलती है उसे हम ना दोहराते है क्या गलत है दोस्तों जो हम अपनी गलती से सीख  लेते है
और उन्हें फिर दोहराने से कतराते है 

कविता २ गुलाब की खुशबु

गुलाबों में खुशबु हमेशा होती है पर तारीफ तोह उस सांसों की जो उन्हें महसूस कराती है
हर बार फूल तो खिलते है खुशबु  हर बार महकती है वह खुशबु जो हमे ख़ुशी हर पल देती है
वह खुशबु समा में होती है पर कभी कभी उसे समजना भी लोगो के लिए गलत बात होती है
कोई महसूस करे उसको तो गुन्हा कहते है लोग मानो इन्सान होना ही कोई खता होती है
खुशबु जो हमे इतनी भाती है वही अगर आराम से महसूस करे तो भी कभी कभी लोगो के लिए
वह बात खता होती है
क्या इन्हे खुश करने के लिए जीना ही  खता होगी हर मोड़ पर जो दिल ख़ुशी को तरसता है
पर हर बार ख़ुशी भी छोटी छोटी बातो में पता है उस दिल को रुलाना भी एक बड़ी खता  ही  होगी
गुलाबों में सुन्दरता बनायीं थी तो उसी अहसास से जिन्दगी में सच्ची ख़ुशी होती है पर लोग चाहते है
उन खुशियो को भूल कर सिर्फ उसे देखे जिसे वह चाहते है हमारे नज़र में वही खता होती है
हर बार हम ख़ुशी चाहते है तो फिर एक गुलाब महसूस करने में भला क्या खता होती है ?
पर ये दुनिया है उसकी हर बात मानना ही अपने दिल पर सबसे बड़ी खता महसूस होती है
क्युकी दुनिया में एक रीत होती है दुनिया अपनी मर्जी से चलती है पर हमे सही करने से भी रोकती है
पर जो उस वक्त नहीं रुकते उनके लिए दुनिया हर बार रुका करती  है

कविता १ तलाश खुदकी

लिखतो लेंगे हम कई बाते पर क्या समज पाएगा कोई खुद को यह सवाल कभी किया करते थे
अब बस लिखा करते है कभी सोचते थे क्या कोई समजेगा हमारी बातो को आज कल बिन सोचे
बस तेरे लिए लिखा करते है
क्युकी तब चाहत थी वाह वाह सुनने की अब इतने तरसे है की परवाह नहीं क्युकी जब तक तू हमारे  साथ है
हमारे  खुदा  हमारे  मन को किसी बात की चिंता ही नहीं
आज तक तूने जो दिया है हमको उस पर ही तेरा शुक्रिया किया ही नहीं लोगो के कहने पर जो किया हमने वह हमें तेरे सजादेमे कभी लगा ही नहीं
हर मोड़ पर जब सही किया और गलत की खिलाफत की तू दिखा सिर्फ तभी बाकि किसी चीज़ में तू दिखा ही नहीं
हर मोड़ पर सिर्फ तेरी तलाश करने वालो को देखा पर हमे तेरी तलाश नहीं क्युकी तू तो हमारा वह दोस्त है
जो हमे छोड़ कर कभी दूर गया ही  नहीं तेरी क्या तलाश करे मेरे ईश्वर तू तो कभी गुम ही नहीं हर शुरआत में तू ही था
 और हर आखिर में तू था अफ़सोस उस बता का है ए दोस्त तुझे तलाशने वालो को तू दिखा क्यों नहीं
शायद वह अपनी ख़ुशी  तलाश ते थे और तू खुशियो में नहीं गमोमे ख़ुशी बनाके बैठा था कही
वह गमोसे किनारा कर के चले गये  तो उसमे क्या गलत है की उन्हें तू दिखा ही नहीं
बड़ी अजीब बात है जो खुद में ही समाया था वह उन्हें दिखा क्यों नहीं उस बात को समज न पाए हम कभी